Hukamnama, हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी

हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 19 जुलाई

सलोक ॥   राज कपटं रूप कपटं धन कपटं कुल गरबतह ॥   संचंति बिखिआ छलं छिद्रं नानक बिनु हरि संगि न चालते ॥१॥  पेखंदड़ो की भुलु तुमा दिसमु सोहणा ॥   अढु न लहंदड़ो मुलु नानक साथि न जुलई माइआ ॥२॥

हे नानक! यह राज रूप धन और (ऊँची) कुल का अभिमान-सब छल-रूप है। जिव छल कर के दूसरों पर दोष लगा लगा कर (कई प्रकार से) माया जोड़ते हैं, परन्तु प्रभु के नाम के बिना कोई भी वस्तु यहाँ से नहीं जाती। तुम्मा देखने में तो मुझे सुंदर दिखा। क्या यह ऊकाई लग गई? इस का तो आधी कोडी भी मुल्य नहीं मिलता। हे नानक! (यही हाल माया का है, जिव के लिए तो यह भी कोड़ी मोल की नहीं होती क्योंकि यहाँ से चलने के समय) यह माया जिव के साथ नहीं जाती।२।