हुक्मनामा

हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 5 सितंबर

तिलंग बाणी भगता की कबीर जी ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ बेद कतेब इफतरा भाई दिल का फिकरु न जाइ ॥ टुकु दमु करारी जउ करहु हाजिर हजूरि खुदाइ ॥१॥ बंदे खोजु दिल हर रोज ना फिरु परेसानी माहि ॥ इह जु दुनीआ सिहरु मेला दसतगीरी नाहि ॥१॥ रहाउ ॥ दरोगु पड़ि पड़ि खुसी होइ बेखबर बादु बकाहि ॥ हकु सचु खालकु खलक मिआने सिआम मूरति नाहि ॥२॥ असमान मिह्याने‍ लहंग दरीआ गुसल करदन बूद ॥ करि फकरु दाइम लाइ चसमे जह तहा मउजूदु ॥३॥ अलाह पाकं पाक है सक करउ जे दूसर होइ ॥ कबीर करमु करीम का उहु करै जानै सोइ ॥४॥१॥

अर्थ: राग तिलंग में भगतों की बाणी; कबीर जी की। अकाल पुरख एक है और सतिगुरू की कृपा द्वारा मिलता है। हे भाई! (वाद-विवाद की खातिर) वेदों कतेबों के हवाले दे दे कर ज्यादा बातें करने से (मनुष्य के अपने) दिल का सहम दूर नहीं होता। (हे भाई!) अगर आप अपने मन को एक पल भर ही टिकाउ, तो आपको सब में ही रब वस्ता दिखेगा (किसी के विरुद्ध तर्क करने की जरुरत नहीं पड़ेगी) ॥१॥ हे भाई! (अपने ही) दिल को हर समय खोज, (बहस करने की) घबराहट में न भटक। यह जगत एक जादू सा है, एक तमाश़ा सा है, (इस में से इस व्यर्थ वाद-विवाद के द्वारा) हाथ आने वाली कोई शै नहीं ॥१॥ रहाउ ॥ बे-समझ लोग (अन-मतों की धर्म-पुस्तकों के बारे यह) पढ़ पढ़ कर (कि इन में जो लिखा है) झूठ (है), ख़ुश हो हो कर बहस करते हैं। (परन्तु वो यह नहीं जानते कि) सदा कायम रहने वाला रब सृष्टि में (भी) वस्ता है, (ना वह अलग सातवें आसमान पर बैठा है और) ना वह परमात्मा कृष्ण की मूर्ति​ है ॥२॥ (सातवें आसमान पर बैठा समझने की जगह, हे भाई!) वह प्रभू-रूप दरिया पर अंतःकरण में लहरें मार रहा है, तुझे उस में स्नान करना था। सो, उस की सदा बंदगी कर, (यह भगती का) चश्मा लगा (कर देख), वह हर जगह मौजूद है ॥३॥ रब सब से पवित्र (हस्ती) है (उस से पवित्र कोई अन्य नहीं है), इस बात पर मैं तब ही शंका करूं, अगर उस रब जैसा कोई अन्य हो। हे कबीर जी! (इस बात को) वह मनुष्य​ ही समझ सकता है जिस को वह समझने-योग्य बनाए। और, यह बख़्श़श़ उस बख़्श़श़ करने वाले के अपने हाथ है ॥४॥१॥