Global Warming

ग्लोबल वार्मिंगः अपने मेन्यू से भी मीट को हटाएं पश्चिमी देश

दुनिया के अधिकांश देशों में किसी न किसी रूप में मांस खाया जाता है। संतुलित मात्रा में मांस खाना हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है। लेकिन मांस ग्रहण करने से भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। पर्यावरण पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञ इस बारे में आगाह   करते आए हैं। उनका कहना है कि विश्व में जिस तरह से लगातार मीट की खपत बढ़ रही है, वह चिंता का विषय है। हाल में इस बारे में जानी-मानी पत्रिका टाइम ने एक लेख जारी किया। इस लेख का शीर्षक था, चीन अपने मेन्यू से मीट को हटाकर विश्व को किस तरह बदल सकता है। जाहिर सी बात है इस आर्टिकल के जरिए यह जताने की कोशिश की गयी है कि चीन का मांस उत्पादों के प्रति गहरा प्रेम है। मैगज़ीन के मुताबिक, अगर चीन अपने खाने की मेज़ से मीट को हटा दे तो वह वैश्विक पर्यावरण संरक्षण में बड़ा योगदान दे सकता है।  

यह पहला मौका नहीं है, जब पश्चिमी मीडिया या वहां के विशेषज्ञों ने चीनी लोगों की खान-पान संबंधी आदतों पर सवाल उठाया है। लेकिन वे यह बताना भूल जाते हैं कि विकसित देशों की पर्यावरण को खराब करने में कितनी बड़ी भूमिका है। इसके साथ ही चीनी लोगों का फ़ूड पैटर्न पश्चिमी लोगों की तुलना में बहुत अलग है। जहां पश्चिमी देशों के नागरिक मांस को प्रमुख भोजन यानी स्टेपल फ़ूड के तौर पर खाते हैं। वहीं चीन में अनाज व सब्ज़ियों के साथ मांस खाया जाता है। कहने का मतलब है कि पश्चिमी राष्ट्रों के आहार में मांस का अनुपात चीन से बहुत ज्यादा है। इसके बावजूद उक्त देश बार-बार चीन पर ही उँगली उठाते हैं।  

ऐसे में प्रश्न यह भी उठता है कि विभिन्न समस्याओं की ज़िम्मेदारी विकासशील देशों के ऊपर डालने के बजाय, पश्चिमी जगत को अपने गिरेबान में भी झांकने की जरूरत है। अगर वे चीन से मांस का इस्तेमाल घटाने की मांग करते हैं तो उन्हें खुद भी इस दिशा में कदम उठाने चाहिए। अगर अमेरिका, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा व ब्रिटेन जैसे देश वास्तव में ग्लोबल वार्मिंग को लेकर इतने चिंतित हैं तो उन्हें अपने मीट उपभोग की मात्रा में भी कटौती करनी होगी। 

(साभार---चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग)  
 




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