China India deadlock

चीन-भारत गतिरोध को कैसे तोड़ा जाए ?

न्यू कोरोना वायरस महामारी ने कई चीजों को बदल दिया है और चीन-भारत संबंधों का भी परीक्षण किया गया है। महामारी से चीन पर भारत की गंभीर आर्थिक निर्भरता जाहिर है, क्योंकि भारतीय उद्योगों के कई कच्चे माल चीन से आते हैं। उदाहरण के लिए, भारतीय दवा उद्योग के कच्चे माल का 70% आयात चीन से होता है। चीन में उत्पादन के निलंबन होने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहुत प्रभाव पड़ा है। पर उधर भारत में कुछ व्यक्तियों का मानना है कि यह भारतीय विनिर्माण को बढ़ावा देने का एक अच्छा अवसर है। इसलिए, भारत सरकार ने बड़े बहुराष्ट्रीय समूहों से निवेश आकर्षित करने के लिए अधिमान्य नीतियां प्रस्तुत की हैं।  

दूसरी ओर, भारत सक्रिय रूप से अमेरिका के "डी-साइनिकाइजेशन" ("De-sinicization") में भाग ले रहा है, चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगा रहा है और चीन से स्वतंत्र एक औद्योगिक श्रृंखला स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका द्वारा अपनायी गयी चीन रणनीति हमेशा सीधे भारत को प्रभावित करती है। उधर भारत में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो चीन-अमेरिका के टकराव से लाभ पाने की उम्मीद करते हैं। इन लोगों ने प्राचीन काल के राजनीतिज्ञ चाणक्य के कूटनीतिक विचारों को गलत समझा और अंधाधुंध तौर पर यह विश्वास रखा कि जब प्रतिद्वंद्वी मुसीबतों में फंसा हो, तब उस प्रतिद्वंद्वी पर हमला करने का अच्छा अवसर है। लेकिन चीनी दर्शन के अनुसार यह स्पष्ट है यानी कि आपके सच्चे दोस्त कौन हैं जब आप सबसे कठिन समय में होते हैं। जब चीन को अमेरिकी खतरों का सामना करना पड़ता है, तो पीछे से चीन पर प्रहार करना सबसे अक्षम्य घृणित कार्य माना जाता है। 

वहीं, चीनी बढ़त की रफ्तार के प्रति भारत भी चिंतित है। 1990 के दशक में, चीन और भारत की जीडीपी एक ही स्तर पर रही। लेकिन अब चीन का अर्थतंत्र भारत की तुलना में 5 गुना अधिक है, और भारत के लिए सबसे खराब स्थिति में चीन की जीडीपी भारत से 10 गुना होगी, जो कि भारत नहीं देखना चाहता है। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में अपना किताब "द इंडिया वे : एक अनिश्चित दुनिया के लिए रणनीतियाँ" (The India Way: Strategies for an Uncertain World) प्रकाशित किया। इस पुस्तक का निष्कर्ष यह है कि भारत को समान लोकतांत्रिक मूल्यों वाले पश्चिमी देशों के साथ खड़ा होना चाहिए। 

हालांकि, किसी भी सिद्धांत को वास्तविक स्थितियों की परीक्षा में से पास होना चाहिये। अगर भारत ने आर्थिक रूप से चीन से जबरन संबंध-विच्छेद किया है , तो भारत को असहनीय दबाव का सामना करना पड़ेगा। चीन को अपने औद्योगिक श्रृंखला का निर्माण करने में 40 साल लग गए, और चीन की राजनीतिक प्रणाली ऐसी होती है कि केंद्र सरकार किसी भी प्रकार की बड़ी सामाजिक गतिविधियों का आयोजन कर सकती है। वही कार्रवाई भारत जैसे देश, जो निजी पूंजी पर निर्भर करता है, करने में असमर्थ है। चीनी अर्थव्यवस्था से संबंध-विच्छेद कर घटते पश्चिमी बाजार पर भरोसा करने से भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य उज्ज्वल नहीं होगा। 

और हमें यह भी देख लेना चाहिए कि चीन वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली को बाधित नहीं करना चाहता है। चीन संयुक्त राष्ट्र संघ, जी 20 और विश्व जलवायु सम्मेलन जैसे अंतर्राष्ट्रीय प्रणालियों को बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है। साथ ही चीन ब्रिक्स के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को भी बढ़ावा दे रहा है। दूसरी ओर, अमेरिका द्वारा प्रवर्तित तथाकथित इंडो-पैसिफिक रणनीति और अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के चार-राष्ट्रों के सैन्य गठबंधन सब चीन के खिलाफ हैं। इस तरह के गठबंधन में भाग लेना, और इसमें सबसे आगे पंक्ति पर खड़े होकर सीधे चीन का सामना करना, यह किसी भी तरह से एक स्मार्ट कदम नहीं है। 

हमें दीर्घकालिक दृष्टिकोण रखना चाहिए। ब्रिक्स के साथियों को छोड़कर पश्चिमी देशों की ओर मुड़ना भारत के लिए फायदेमंद नहीं हो सकता है। क्योंकि इससे न केवल चीन-भारत मित्रता को कमजोर किया जाए, बल्कि रूस को भी अपमानित होगा। रूस भारत का अमेरिका के अधीन में रखना नहीं देखना चाहेगा। रूस ने हाल ही में सीमा मुद्दे को शांतिपूर्ण ढंग से हल करने के लिए चीन और भारत से आग्रह करने में सक्रिय भूमिका निभाई है। चाणक्य के राजनयिक सिद्धांत का मूल यही है कि किसी भी विकल्प क्यों न हो, यह देश के मौलिक और दीर्घकालीन हितों की रक्षा के लिए अनुकूल होना चाहिए। इसी आधार पर ही चीन-भारत संबंधों पर विचार करना बुद्धिमानी है।
( साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग )




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