global epidemic

यदि जलवायु परिवर्तन को एक वैश्विक महामारी मान लें तो?

एड्स से लेकर सार्स, और पिछले साल की सबसे बड़ी महामारी कोविड-19 के वायरस तक हमने देखा है कि कैसे दुनिया के लोग साथ आकर ऐसी स्वास्थ्य आपदाओं का सामना करते हैं। महामारियों और वैश्विक महामारियों के दौर में, दुनिया समस्या का निदान ढूंढने के लिए कड़ी मेहनत करने में लग जाती है।  लेकिन अगर हम ऐसे हर संक्रमण को हराने में सफल हो भी जाते हैं, तो इसका तब तक कोई फायदा नहीं जब तक इनसे जीतने के बाद खड़े होने के लिए ये धरती ही ना बचे। यदि हम जलवायु परिवर्तन को भी एक वैश्विक महामारी मान लें, तो अवश्य ही हमारी समस्या का समाधान हो सकता है।

फिलहाल, इस समय फैल रही महामारी पर जानकारी लेने के लिए मोबाइल और टीवी स्क्रीन से चिपके रहते हैं, मीडिया में देखते हैं कि कितने मामले सामने आये, और पूरे दिन कोरोना महामारी से संबंधित बातों पर चर्चा करते रहते हैं। लेकिन साल 2019 में, अमेरिका में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी खबरें एक फीसदी से भी कम वक्त के लिए दिखाई गई हैं। क्या ऐसा इसलिए कि महमारी को तो आज का बड़ा खतरा माना जाता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन को भविष्य की समस्या समझा जाता है? हमने दुनिया को एकजुट होकर वायरस को भगाने की कोशिश करते देखा है। लेकिन ये सोच पाना इससे ज्यादा मुश्किल है कि वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़त कितनी भयानक होगी। अगर वायरस के खिलाफ लड़ाई में जो हमने सीखा है, हम उसका इस्तेमाल करें और उसी तरीके से जलवायु परिवर्तन से भी लड़े, तो कैसा रहेगा? सबसे पहले समझना होगा कि जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है और इसका असर सब पर होता है। इसके लिए दुनिया के सभी राष्ट्रों को पवन ऊर्जा पर निवेश करना चाहिए। यह ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकने का सबसे अच्छा तरीका है।

अगर साल 2050 तक, हम पवन चक्कियों की संख्या बढ़ा देते हैं, तो इससे पैदा होने वाली दुनिया की 4.4 प्रतिशत बिजली बढ़कर 26.9 प्रतिशत तक हो जाएगी। इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 147 गीगाटन तक कम हो सकेगा, यानी की साल 2018 में अमेरिका के परिवहन सेक्टर से निकली कार्बन डाईऑक्साइड से 70 गुना अधिक। हालांकि, इसमें 1,659 अरब डॉलर की लागत आएगी, लेकिन साथ ही हम 10 खरब डॉलर की बचत भी कर पाएंगे। इसके अलावा, सौर ऊर्जा से हम साल 2050 तक 25 फीसदी बिजली बना सकते हैं और इससे ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 119 गीगाटन की कमी आएगी। इतना ही नहीं, अगर हम चाहें तो साल 2050 तक खाने की बर्बादी 75 फीसदी तक कम कर सकते हैं, जिससे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 18.8 गीगाटन की कमी आएगी। इससे जंगलों की कटाई भी कम होगी यानी 73.6 गीगाटन उत्सर्जन की बचत होगी। 

इन सबसे मिलकर हम 438.4 गीगाटन ऊर्जा की बचत कर सकते हैं। हमें अपनी सेवाओं, शोध, और स्वच्छ ऊर्जा में अपने निवेश को बढ़ाना होगा, और वातावरण को वापिस पहले जैसा करना होगा। सुनने में ये बहुत ज्यादा लगता है। लेकिन जरा सोचिए, दुनिया ने हाल में आयी महामारी का सामना कितनी तेजी के साथ आकर किया है। अगर हम साथ मिलकर काम करते हैं तो ये जरूर मुमकिन हो सकता है। हम आज ही जलवायु परिवर्तन से लड़ाई शुरू कर सकते हैं। हमारे पास इसके लिए जरूरी भरपूर जानकारी और तकनीक है, और हमारे पास सूरज, हवा, पानी, और जमीन के नीच के गर्म पानी की ढेर सारी ऊर्जा भी है।
(साभार---चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग)



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