China

चीन के हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में गुरु चिन तिंगहान की याद में

गुरु चिन तिंगहान जी के निधन की बुरी खबर सुनकर मैं दुःख के सागर में डूब गया हूं। पेइचिंग विश्वविद्यालय के हिन्दी भाषा व साहित्य क्लास में गुरु जी की व्याख्यान देने की आवाज और मुस्कुराहट की छवि फिर एक बार आंखों के सामने उभरने लगी है। चीन के हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में श्री चिन तिंगहान उत्कृष्ट विद्वान रहे हैं। उन्होंने न केवल बहुत से छात्रों को प्रशिक्षित किया, बल्कि खुद भी लेखन और अनुवाद का काम किया।

उन्होंने पेइचिंग विश्वविद्यालय में हिंदी का अध्ययन किया और बाद में इस विभाग में प्रोफेसर बने। उन्होंने अपना पूरा जीवन हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के शिक्षण, शोध और प्रचार-प्रसार में बिताया। चीन व भारत के बीच मित्रता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना उनका जिंदगी भर का करियर और आदर्श रहा। उनके व्याख्यानों के अलावा बहुत सारा अनुवाद और लेखन भी मेरे ज़हन में ताज़ा है। जैसे "हिंदी चीनी शब्दकोश", "बेसिक हिंदी कोर्स", "हिंदी चीनी मुहावरे का शब्दकोश","हिन्दी भाषा की समाचार शब्दावली" तथा "रामचरितमानस" आदि भी शामिल हैं। ये शब्दकोश आज भी मेरी मेज़ पर रखे हुए हैं और इनका हर दिन इस्तेमाल होता है। 

अपने गहरे ज्ञान के साथ, चिन तिंगहान हिंदी भाषा और साहित्य के अध्ययन के बारे में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त शख्सियत बन गए। पेइचिंग विश्वविद्यालय में शिक्षण और शोध के अलावा, उन्होंने कई बार भारत और अन्य देशों के उच्च शिक्षा संस्थानों में व्याख्यान भी दिए। भारत सरकार द्वारा उन्हें कई बार हिंदी भाषा के सर्वोच्च सम्मान से पुरस्कृत किया गया। गुरु जी ने हमें कई बार बताया कि चीन और भारत दोनों प्राचीन सभ्यता वाले देश हैं, और दोनों को सांस्कृतिक क्षेत्र में अधिक आदान-प्रदान करना चाहिए। उनका मानना ​​है कि भारतीय संस्कृति की "रोमांटिक" विशेषता है, जबकि चीनी संस्कृति "व्यावहारिक" तत्व पर जोर देती है। दूसरे शब्दों में, भारतीय दर्शन मनुष्य और भगवान के बीच के रिश्ते की दृष्टि से दुनिया को समझता है जबकि चीनी संस्कृति वास्तविकता का पीछा करती है। दोनों को एक दूसरे से सीखना चाहिए और एक दूसरे का पूरक बनना चाहिए। उदाहरण के लिए, चीन ने भारत से आये बौद्ध धर्म से "जगत", "अवतार" और "पुनर्जन्म" जैसी अवधारणाओं को अवशोषित किया है, जबकि भारतीय भाषा में "रेशम", "चीनी", "लीची" और "चाय" जैसे शब्द सभी चीन से पहुंचे हैं। 

मुझे याद है कि गुरु जी कहा करते थे कि चीन और भारत के लोगों में एक-दूसरे के प्रति स्वाभाविक मित्रता है। दोनों देशों की आबादी विश्व का चालीस प्रतिशत भाग है। अगर चीन और भारत एक ही आवाज में बोलें, तो पूरी दुनिया इसे ध्यान से सुनेगी। इसलिए, दोनों देशों को खुला और ईमानदार रुख अपनाकर संवाद और चर्चा के तरीकों के माध्यम से गलतफहमी और मौजूद समस्याओं को हल करना चाहिये। दोनों देशों के आम लोगों, विशेषकर युवाओं के बीच अधिक आदान-प्रदान का बहुत महत्व है। 
गुरु चिन तिंगहान इस दुनिया से जा चुके हैं। यह दुखद और अफ़सोस की बात है कि हम फिर उनकी हंसी और व्याख्यान कभी भी नहीं सुन पाएंगे। लेकिन गर्व की बात है कि गुरु जी ने कई छात्रों को प्रशिक्षित किया है, जो अभी भी चीन-भारत मित्रता के लिए पूरा प्रयास कर रहे हैं। 
चिन तिंगहान हमेशा ज़िंदा रहेंगे हमारे दिल में

पेइचिंग विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ फॉरेन लैंग्वेजेज के प्रोफेसर और चीन के हिन्दी भाषा व साहित्य के विद्वान चिन तिंगहान का निधन 28 नवंबर, 2020 को 90 साल की उम्र में हुआ। गुरु जी का अंतिम संस्कार 6 दिसंबर को होगा। श्री चिन तिंगहान का जन्म 13 सितंबर 1930 को दक्षिण चीन के हुनान प्रांत में हुआ। 1951 में, उन्होंने पेइचिंग विश्वविद्यालय में हिंदी भाषा का अध्ययन शुरू किया। 1955 में वे स्नातक होने के बाद स्कूल में रहे और बाद में पेइचिंग विश्वविद्यालय के पूर्वी भाषा विभाग में प्रोफेसर के रूप में हिंदी के शिक्षण और अनुसंधान में लगे रहे। वह चीनी अकादमी ऑफ सोशल साइंसेज के शोधकर्ता और चीनी दक्षिण एशियाई सोसाइटी के सदस्य भी थे।

चिन तिंगहान की प्रधानता में संपादित "हिंदी चीनी शब्दकोश", "हिंदी चीनी मुहावरे का शब्दकोश" तथा "हिन्दी भाषा की समाचार शब्दावली" आदि सबसे प्रभावशाली संदर्भ पुस्तकें मानी जाती हैं। उनकी अनुवादित पुस्तकों में तुलसीदास की लंबी कथा कविता "रामचरितमानस", प्रेमचंद का उपन्यास "निमोला" तथा यशपाल का उपन्यास "झूठा सच" आदि हिन्दी साहित्य के क्लासिक्स शामिल हैं। इसके अलावा, उन्होंने "रामायण और चीन", "प्रेमचंद की भाषा शैली", "चीनी साहित्य में हिंदू भगवान" सहित दर्जनों शोध लेख प्रकाशित किए। 

प्रोफेसर चिन तिंगहान को समृद्ध शिक्षण अनुभव हासिल हुए। उन्होंने "हिन्दी भाषा", "हिन्दी अनुवाद", "हिन्दी भाषा का विश्लेषण" और "हिन्दी वार्तालाप" जैसे कई पाठ्यक्रम पढ़ाए हैं। उन की प्रधानता से संपादित पाठ्यक्रम सामग्री जिसमें "बेसिक हिन्दी कोर्स", "हिन्दी व चीनी व्याकरण की तुलना" आदि भी शामिल हैं। प्रोफेसर चिन तिंगहान ने कई बार भारत के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय और बेनेल्स विश्वविद्यालय, ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और लंदन विश्वविद्यालय, तथा अमेरिका, नीदरलैंड और जापान के विश्वविद्यायलों में भी व्याख्यान दिये। प्रोफेसर चिन तिंगहान ने 13 वें और 16 वें अंतर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन के अध्यक्ष, तथा 10 वीं अंतर्राष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय हिंदी अध्ययन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान दिया है।

चिन तिंगहान को हिंदी शिक्षण और अनुसंधान और चीन व भारत के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान में उत्कृष्ट उपलब्धियों के साथ कई सम्मान समर्पित किये गये : जैसे 1990 में "चीन-भारत मैत्री पुरस्कार" , 1993 में "विश्व हिंदी सम्मान पुरस्कार", 1999 में विश्व तुलसी सम्मान, 2001 में उन्हें तत्कालीन भारतीय राष्ट्रपति के.आर. नारायणन द्वारा "जॉर्ज ग्लीसन अवार्ड" से सम्मानित किया गया। और अगस्त 2015 में उन्हें भारतीय साहित्य अकादमी द्वारा मानद शिक्षाविद के रूप में सम्मानित किया गया। और यह भी उल्लेखनीय है कि चिन तिंगहान ने अपनी पुरस्कार राशि और पारिश्रमिक का पेइचिंग विश्वविद्यालय में एक भारतीय अनुसंधान छात्रवृत्ति की स्थापना में इस्तेमाल किया। उन्होंने अपना पूरा जीवन चीन व भारत के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए पुल बनाने में बिताया। 
( लेखकहूमिन, पेइचिंग ) 


Loading ...