Naagpanchami 2020

पौराणिक कथाओं से जानिए शेषनाग और वासुकी नाग के बारे में, जिन्होंने नाग जाति को बचाने के लिए किए अनेकों प्रयास

हर साल नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है, जिस दिन सभी नागदेवता की पूजा विधिवत रुप से कर अपने कष्टों से मुक्ति प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं। हर साल की तरह इस साल भी यह पर्व मनाया जाएगा जो 25 जुलाई के दिन पड़ रहा है। हिंदू धर्म में नागों को भी देवता माना गया है महाभारत आदि ग्रंथों में नागों की स्थिति के बारे में बताया गया है, इनमें शेष नाग, वासुकी, तक्षक आदि प्रमुख है। आइए जानते हैं इन नागों के बारे में-

शेषनाग: वरदान दिया शेषनाग का एक नाम अनंत भी है शेष नाग ने जब देखा कि उनकी माता का कद्रू और  भाइयों ने मिलकर विनता के साथ छल किया है तो उन्होंने अपनी मां और भाइयों का साथ छोड़कर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करना आरंभ किया, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें कि तुम्हारी बुद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं होगी। ब्रह्मा जी ने शेषनाग को यह भी कहा कि यह पृथ्वी निरंतर ही हिलती-डुलती रहती है। इसलिए इसे अपने ऊपर इस प्रकार धारण करो कि यह स्थिर हो जाए क्षीर सागर में भगवान विष्णु  शेषनाग के आसन पर ही विराजित होते हैं। 

वासुकी: नागधर्म ग्रंथों के अनुसार वासुकी नाग को नागों का राजा बताया गया है, यह भगवान शिव के गले में लिपटे रहते हैं। यह महर्षि कश्यप व कद्दू की संतान है। इनकी पत्नी का नाम शतशीर्षा है इनकी बुद्धि भगवान की भक्ति में लगी रहती है। जब माताकद्रू ने नागों को सर्प यज्ञ  में भस्म होने का श्राप दिया था तब नाग जाति को बचाने के लिए वासुकि काफी चिंतित हुए थे, तब एलापत्र नामक नाग ने उन्हें बताया कि आपकी बहन जरत्कारु और से उत्पन्न पुत्र ही नाग जाती को बचा पाएंगे। तब नागराज वासुकी ने अपनी बहन जरत्कारु का विवाह ऋषि जरत्कारु से करवा दिया समय आने पर जरत्कारु ने आस्तिक नामक विद्वान पुत्र को जन्म दिया आस्तिक ने प्रिय वचन कहकर राजा जन्मेजय के यज्ञ को बंद करवाया था। 

कर्कोटक नाग: कर्कोटक शिव के एकगण है। पुरानी कथाओं के अनुसार सांपों की मां का कद्रू जब नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब भयभीत होकर कंबल नागब्रह्मा जी के लोक में  , शंखचूड़ मणिपुर राज्य में, कालिया नाग यमुना में और धृतराष्ट्र नाग प्रयाग मे, एलापत्र ब्रह्मलोक में और अन्य कुरुक्षेत्र में तप करने चले गए ब्रह्मा जी के कहने पर कर्कोटक नाग ने महाकाल वन में महामाया के सामने स्थित शिवलिंग की तपस्या की, शिव ने प्रसन्न होकर कहा जो नाग धर्म का आचरण करते हैं। उनका विनाश नहीं होगा इसके बाद कर्कोटक नाग उसी शिव लिंग प्रवेश कर गया तब से उस शिवलिंग को  कोटेश्वर कहते हैं मान्यता है कि जो लोग पंचमी, चतुर्दशी और रविवार के दिन कोटेश्वर शिवलिंग की पूजा करते हैं उन्हें  सर्प पीड़ा नहीं होती।