रामायण

जानिए रामायण का कौवे और गरुड़ से जुड़ा ये एक खास किस्सा

रामायण हिन्दू रघुवंश के राजा राम की गाथा है। यह आदि कवि वाल्मीकि द्वारा लिखा गया संस्कृत का एक अनुपम महाकाव्य, स्मृति का वह अंग है। इसे आदिकाव्य[1] तथा इसके रचयिता महर्षि वाल्मीकि को 'आदिकवि' भी कहा जाता है। रामायण के छः अध्याय हैं जो काण्ड के नाम से जाने जाते हैं, इसके 24000  श्लोक[ख] हैं।

उत्तराखंड...जिसके कण कण में कोई ना कोई पौराणिक राज़ छिपा है. जिसकी ऊंची पर्वत चोटियों से लेकर कनखल नगरी तक में निहीत हैं कई रहस्य. ऐसा ही एक रहस्य अपने भीतर समेटे है यहां मौजूद काकभुशुण्डि ताल. जो उत्तराखंड के चमोली जिले में मौजूद है. इस झील को बेहद ही पवित्र माना जाता है क्योंकि इसका संबंध रामायण काल से है. 

जी हां….त्रेता युग से जुड़ी इस झील को लेकर कई पौराणिक मान्यताएं मौजूद हैं. यही कारण है कि स्थानीय लोगों में इस झील के प्रति काफी आस्था है. तभी तो इतनी ठंडी जगह पर मौजूद होने के बाद भी लोग इस झील में डुबकी लगाकर अपने पापों से मुक्ति पाते हैं. आइए बताते हैं आपको इस झील का ऐतिहासिक महत्व. 

कहां और कैसी है झील
तकरीबन 1 किलोमीटर तक फैली ये झील चमोली में 4500 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद है. हाथी पर्वत के तल पर मौजूद इस झील का पानी हल्के हरे रंग का है जो बेहद ही खूबसूरत नज़र आती है. यह झील विश्व धरोहर स्थल नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व में मौजूद है जिसका रास्ता कांकुल दर्रे से होकर निकलता है. 

रामायण काल से है संबंध 
ये झील और भी विशेष इसीलिए हो जाती है क्योंकि इसका संबंध रामायण काल से बताया जाता है. लोक मान्यता के मुताबिक रामायण के एक पात्र काकभुशुण्डि ने यहां कौवे का रूप धारण किया और गरुड़ को रामायण की कथा सुनाई थी. इसीलिए इस झील को काफी पवित्र माना जाता है. मान्यता है कि यहां पर स्नान करने से पाप नष्ट हो जाते हैं.

कौन थे काकभुशुण्डि
ग्रंथों में जिक्र मिलता है कि लोमश ऋषि ने श्राप दिया था जिसके कारण ही काकभुशुण्डि कौवा बन गए थे और उन्होंने पूरा जीवन कौवे के रूप में ही जीया. ऐसा कहा जाता है कि काकभुशुण्डि ने वाल्मीकि से भी पहले रामायण गरूड़ को इसी झील के किनारे सुनाई थी. कहा जाता है कि जब राम-मेघनाद युद्ध के दौरान भगवान नागपाश से बांध दिए गए. तब गरूड़ ने ही भगवान राम को मुक्त कराया था। जिससे गरूड़ को उनके भगवान होने पर शक हुआ। वो ब्रह्मा जी के पास पहुंचे. ब्रह्मा जी ने उन्हें भगवान शिव के पास भेजा और वहां से भगवान शिव ने उन्हें काकभुशुण्डि के पास भेज दिया था. तब काकभुशुण्डि ने गरूड़ को रामायण कथा सुनाई थी.

कैसे पहुंचे काकभुशुण्डि ताल?
अगर इस ताल की महिला जानने के बाद आप यहां जाने के बारे में सोच रहे हैं तो हम आपको बताते हैं कि आप यहां कैसे पहुंच सकते हैं. इसके लिए आपको सबसे पहले उत्तराखंड के जोशीमठ पहुंचना पड़ेगा. यहां से दो रास्ते हैं एक भुइंदर गांव से घांघरिया के पास से और दूसरा सरा गोविंद घाट से. जोशीमठ पहुंचने के लिए आप देहरादून तक की फ्लाइट ले सकते हैं यहां फिर बस व ट्रेन सेवा से भी पहुंचा जा सकता है. देहरादून पहुंचने के बाद आप प्राइवेट टैक्सी या कार से आगे का सफल तय कर सकते हैं.