हुक्मनामा

हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 30 अक्टूबर

सूही महला ५ ॥ सिम्रिति बेद पुराण पुकारनि पोथीआ ॥ नाम बिना सभि कूड़ु गाल्ही होछीआ ॥१॥ नामु निधानु अपारु भगता मनि वसै ॥ जनम मरण मोहु दुखु साधू संगि नसै ॥१॥ रहाउ ॥ मोहि बादि अहंकारि सरपर रुंनिआ ॥ सुखु न पाइन्हि मूलि नाम विछुंनिआ ॥२॥ मेरी मेरी धारि बंधनि बंधिआ ॥ नरकि सुरगि अवतार माइआ धंधिआ ॥३॥ सोधत सोधत सोधि ततु बीचारिआ ॥ नाम बिना सुखु नाहि सरपर हारिआ ॥४॥ आवहि जाहि अनेक मरि मरि जनमते ॥ बिनु बूझे सभु वादि जोनी भरमते ॥५॥ जिन्ह कउ भए दइआल तिन्ह साधू संगु भइआ ॥ अम्रितु हरि का नामु तिन्ही जनी जपि लइआ ॥६॥ खोजहि कोटि असंख बहुतु अनंत के ॥ जिसु बुझाए आपि नेड़ा तिसु हे ॥७॥ विसरु नाही दातार आपणा नामु देहु ॥ गुण गावा दिनु राति नानक चाउ एहु ॥८॥२॥५॥१६॥

अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य वेद-पुराण-स्मृतियाँ आदि पुस्तकें पढ़ कर (नाम को किनारे छोड़ के कर्मकांड आदि के उपदेश) ऊँचे स्वरों में सुनाते फिरते हैं, वे लोग थोथी बातें करते हैं। परमात्मा के नाम के बिना झूठा प्रचार ही ये सारे लोग करते हैं।1। हे भाई! परमात्मा के नाम का बेअंत खजाना (परमात्मा के) भक्तों के हृदय में बसता है। गुरु की संगति में (नाम जपने से) जनम-मरण के दुख और मोह आदि हरेक कष्ट दूर हो जाते हैं।1। रहाउ। हे भाई! प्रभु के नाम से विछुड़े हुए मनुष्य कभी भी आत्मिक आनंद नहीं पाते। वह मनुष्य माया के मोह में, शास्त्रार्थ में, अहंकार में फंस के अवश्य दुखी होते हैं।2। हे भाई! (परमात्मा के नाम से टूट के) माया की ममता का विचार मन में टिका के मोह के बंधन में बँधे रहते हैं। निरी माया के झमेलों के कारण वे लोग दुख-सुख भोगते रहते हैं।3। हे भाई! अच्छी तरह पड़ताल करके निर्णय करके हम इस सच्चाई पर पहुँचे हैं कि परमात्मा के नाम के बिना आत्मिक आनंद नहीं मिल सकता। नाम से टूटे रहने वाले अवश्य ही (मनुष्य जन्म की बाजी) हार के जाते हैं।4। (परमात्मा के नाम से टूट के) अनेक प्राणी (बार-बार) पैदा होते मरते हैं। आत्मिक मौत सहेड़-सहेड़ के बार-बार जन्म लेते रहते हैं। (आत्मिक जीवन की) सूझ के बिना उनका सारा ही उद्यम व्यर्थ रहता है, वे अनेक जूनियों में भटकते रहते हैं।5। हे भाई! जिस मनुष्यों पर परमात्मा दयावान होता है उन्हें गुरु की संगति प्राप्त होती है, वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम जपते रहते हैं।6। हे भाई! करोड़ों, अनगिनत, बेअंत, अनेक ही प्राणी (परमात्मा की) तलाश करते हैं, पर परमात्मा स्वयं जिस मनुष्य को सूझ बख्शता है, उस मनुष्य को प्रभु की समीपता मिल जाती है।7। हे नानक! (प्रभु चरणों में अरदास कर और कह:) हे दातार! मेरे अंदर ये तमन्ना है कि मैं दिन-रात तेरे गुण गाता रहूँ। मुझे अपना नाम बख्श। मैं तुझे कभी ना भुलाऊँ।8।2।5।