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डब्ल्यूएचओ वार्ता में क्यों नेतृत्वकारी भूमिका निभाना चाहता है अमेरिका?

अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की सदस्यता छोड़ी, लेकिन वह फिर भी डब्ल्यूएचओ में सुधार का नेतृत्व करना चाहता है। जर्मनी और फ्रांस ने इसका विरोध जताया और डब्ल्यूएचओ में सुधार से जुड़े वार्ता से बाहर निकलने की घोषणा की। जर्मनी और फ्रांस का विचार है कि अगर अमेरिका दखल देता है, तो वार्ता की प्रक्रिया काफी लंबी होगी। दूसरी तरफ, अमेरिका डब्ल्यूएचओ से बाहर निकला है, लेकिन फिर भी संगठन के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करना चाहता है, यह उचित नहीं है। तो अमरिका क्यों ऐसा करना चाहता है? यह स्पष्ट है कि अमेरिका अपनी नेतृत्व भूमिका साबित करना चाहता है। लेकिन दूसरे देश इससे असंतुष्ट हैं। अमेरिका कोविड-19 महामारी से गंभीर रूप से ग्रस्त है। इसके डब्ल्यूएचओ से हटने से कुछ न कुछ संबंध होते हैं। महामारी फैलने के बाद अमेरिका ने डब्ल्यूएचओ को अन्य देशों पर हमला करने का अपना उपकरण बनाने की कोशिश की, लेकिन डब्ल्यूएचओ का रुख हमेशा स्पष्ट रहता है, यानी कि कौन देश सफलता से महामारी की रोकथाम करता है और अन्य देशों की सहायता करता है, तो डब्ल्यूएचओ किसका समर्थन करता है।

इसकी वजह से अमेरिका की कुचेष्टा सफल नहीं हुई और ट्रंप ने अमेरिका के डब्ल्यूएचओ से हटने की घोषणा की। अमेरिका की एकतरफा कार्रवाई का अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने विरोध किया। वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा में सबसे अधिकृत और पेशेवर अंतर्राष्ट्रीय संगठन होने के नाते डब्ल्यूएचओ ने महामारी की रोकथाम में केंद्रीय भूमिका निभाई। बहुत-से देश डब्ल्यूएचओ के आभारी हैं, लेकिन इस स्थिति में अमेरिका की कार्रवाई स्वीकृत नहीं होती। अमेरिका जी-7 के प्रयोग से डब्ल्यूएचओ को अपने हित के अनुरूप अंतर्राष्ट्रीय संगठन बनाना चाहता है और डब्ल्यूएचओ के सुधार में निश्चयात्मक भूमिका निभाना चाहता है, लेकिन अमेरिका डब्ल्यूएचओ से बाहर निकला है। निस्संदेह अमेरिका अपनी इच्छा से डब्ल्यूएचओ में सुधार करने का फैसला नहीं कर सकता। एक सार्वजनिक संगठन होने के नाते डब्ल्यूएचओ पर कोई राजनीतिक प्रभाव नहीं डालना चाहिए। अमेरिका की कार्रवाई से व्हाइट हाउस का प्रभुत्वावादी लक्ष्य साफ तौर पर देखा जा सकता है।