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अंतरिक्ष यात्रा और चंद्र अन्वेषण का क्या महत्व है?

इस महीने, अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष उड़ान और चंद्र अन्वेषण का एक नए चरमोत्कर्ष में प्रवेश हुआ है। चीन ने "छांग-अ नम्बर 5" चंद्रयान प्रक्षेपित किया, अमेरिका के नासा ने एक विशाल रॉकेट की असेम्बलिंग शुरू की जो अगले साल चंद्रमा पर वापसी की पहली उड़ान को अंजाम देने का मिशन निभाएगा। उधर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो भी अपने चंद्रयान नम्बर 3 प्रक्षेपित करने के लिए अंतिम तैयारी कर रहा है। चंद्रमा एक ऐसा गंतव्य है जिसे विश्व के सभी बड़े देश जोरों पर तलाशने का प्रयास कर रहे हैं। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ ने पहले चंद्रमा पर उतरने के लिए बहुत पैसा खर्च किया था। अंत में अमेरिका ने जीत हासिल की और अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री पहले चंद्रमा की सतह पर उतरे।

नई सदी में, चीन और भारत वास्तव में चंद्र अन्वेषण के अग्रणी पंक्ति में खड़े हुए हैं। चीन का "छांग-अ नम्बर 5" चंद्र रोवर चंद्रमा से 2 किलोग्राम चट्टान और मिट्टी वापस लाने का मिशन पूरा करेगा। उधर भारत भी अगले मार्च में चंद्रमा की सतह पर उतरने के मिशन को पूरा करने के लिए अपना चंद्रयान नम्बर 3 प्रक्षेपित करेगा। लेकिन, अंतरिक्ष मिशन केवल बड़े देशों के बीच की प्रतियोगिता नहीं है। अब दक्षिण कोरिया और यूएई यानी संयुक्त अरब अमीरात चंद्र अन्वेषण और मंगल अन्वेषण लक्ष्यों के लिए सहयोग कर रहे हैं। जुलाई 2020 में, यूएई ने अपना "होप" मंगल रोवर लॉन्च किया। जबकि दक्षिण कोरिया ने 2022 में चंद्र ऑर्बिटर और 2030 से पहले चंद्रमा की सतह पर एक लैंडर लॉन्च करने की योजना बनाई है। दोनों देशों के बीच संयुक्त चंद्र और मंगल अन्वेषण मिशन निभाने की योजना कायम की जाएगी। दक्षिण कोरिया और यूएई के भविष्य में एक दूसरे के चंद्रमा और मंगल कार्यक्रमों में शामिल होने की उम्मीद है।

देर से आने वालों की चुनौतियों से अमेरिका स्वाभाविक रूप से आंखें मूंदे बैठा नहीं रह सकता है। 26 नवंबर को, नासा ने लॉन्च प्लेटफॉर्म पर अपना एसएलएस रॉकेट को इकट्ठा करना शुरू कर दिया है जो अगले साल अपनी पहली उड़ान भरेगा। इसका पहला मानवयुक्त मिशन 2024 में योजनाबद्ध है। यानी अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री 2024 में फिर से चांद पर उतरेंगे। इसके अलावा, यूरोप और जापान भी सक्रिय रूप से अपनी चंद्र अन्वेषण योजना तैयार कर रहे हैं। रूस ने चंद्र अन्वेषण से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय सहयोग में सक्रियता से भाग लेने की अपनी इच्छा का भी संकेत दिया है।
भारत ने 22 अक्टूबर, 2008 को अपनी रॉकेट पीएसएलवी-सी 11 के माध्यम से चंद्रयान -1 को लॉन्च किया। उस समय, मैं भी भारत के विज्ञान शहर बंगलुरु में साक्षात्कार करने का काम कर रहा था। इस चंद्रमा अन्वेषण के प्रति भारत के आम लोगों से वैज्ञानिक जगतों तक के उत्साह ने मुझे गहरी छाप छोड़ी। तो, चांद का पता लगाने में भाग लेने में विभिन्न देशों के लिए असली प्रेरणा क्या है? क्या यह सिर्फ राष्ट्रीय सम्मान के लिए है? बात शायद इतना सरल नहीं है। तकनीकी प्रगति की अंतर्निहित आवश्यकताओं के अलावा अंतरिक्ष अन्वेषण करने का व्यावहारिक लाभ भी है। उदाहरण के लिए यूएई की "मंगल 2117 रणनीति" के अनुसार दुबई में एक मंगल विज्ञान शहर का निर्माण किया जाएगा, जिसमें खाद्य, ऊर्जा, जल संसाधन और कृषि के लिए वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं शामिल होंगी। इसका लक्ष्य मुख्य रूप से भविष्य के खाद्य और संसाधन सुरक्षा के लिए है। जहां वैज्ञानिक कर्मी 3-डी प्रिंटिंग और गर्मी / विकिरण अलगाव प्रौद्योगिकी के माध्यम से मार्टियन वातावरण में जीवित रहने की तकनीकों का अनुसंधान करेंगे।
 
एयरोस्पेस तकनीक सीधे हमारे दैनिक जीवन की सेवा करती है। आज हम जिन तकनीकों का आनंद ले रहे हैं उनमें से कई अंतरिक्ष अन्वेषण के प्रत्यक्ष उत्पाद हैं। उदाहरण के लिए, अंतरिक्ष यात्रियों के सूट में उपयोग किए जाने वाले कपड़े अब लोकप्रिय पोशाक बन गए हैं। अंतरिक्ष यान में बढ़िया कृषि किस्मों का प्रजनन भी किया जा सकता है। इसके अलावा, और कई प्रौद्योगिकियां, जैसे कि उपग्रह पोजिशनिंग, दूर संचार और महासागर की निगरानी आदि भी एयरोस्पेस तकनीक का परीणाम है। एयरोस्पेस और चंद्र अन्वेषण अधिकाधिक देशों की विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास योजना में शामिल होगा। और मुझे आशा है कि एयरोस्पेस विज्ञान और प्रौद्योगिकी, चंद्रमा अन्वेषण और अन्य अंतरिक्ष उड़ानों को हमेशा शांति मिशन के उद्देश्य में अंजाम दिया जाएगा।
( लेखकहूमिन )


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