Europe

यूरोप में बढ़ते आतंकवाद का जिम्मेदार कौन?

एक समय था जब दुनिया भर से लोग यूरोप का रुख इसलिए करते थे कि वहां उन्हें सुरक्षा और सुकून की गारंटी मिलती थी, लेकिन मौजूदा हालात के मुताबिक दुनिया में सबसे असुरक्षित कोई जगह है तो वह यूरोप ही है। पिछले कुछ सालों से यूरोप कठिनाइयों की बेड़ियों में ऐसा जकड़ा हुआ है कि अब तक उभर नहीं पाया है; इसकी वजह न केवल उसकी अर्थव्यवस्था का धीमा होना है बल्कि आतंकवाद रूपी राक्षस की चपेट में आना भी एक महत्वपूर्ण कारण है। आतंकी वारदातों और इस्लामी चरमपंथियों की धमकियों के चलते यूरोप के हालात बहुत खराब हो गये हैं। 

अभी एक दिन पहले फ्रांस के नीस शहर में नोट्रेड्रम चर्च के बाहर एक शख्स ने लोगों पर चाकू से हमला किया है, जिसमें कम से कम 3 लोगों की मौत हुई है और कई अन्य घायल हो गए हैं। उस हमले में एक महिला का सिर काट दिया गया। वह हमलावर 'अल्लाह हू अकबर' के नारे लगा रहा था। अभी दो सप्ताह पहले, इसी तरह की एक और आतंकी वारदात सामने आई थी जब पैगंबर कार्टून विवाद में एक शिक्षक की गला रेत कर हत्या कर दी गई।

इन कुछेक आतंकी हमलों को छोड़ भी दें, तो 7 जनवरी 2015 को पेरिस में मशहूर व्यंग्य पत्रिका चार्ली ऐब्दो के दफ्तर में हुए आतंकी हमले में 20 लोगों की जान गई, जिसने यूरोप समेत पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया। इस हमले से फ्रांस उबरा भी नहीं था कि 13 नवम्बर 2015 को राजधानी पेरिस में हुए एक बड़े आतंकी हमले में कम से कम 140 लोगों के मारे जाने और 55 लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की खबर ने समूची मानवता को एक बार फिर दहला दिया। न केवल फ्रांस बल्कि लंदन समेत दूसरे यूरोपीय शहरों के लोग भी खौफ में हैं कि न जाने कब और कहां उनकी दुनिया में आतंक के धमाके सुनाई दे जाएं।

उसी साल 13 नवंबर को पेरिस में आतंकी हमला होने के एक सप्ताह बाद ही ब्रसेल्स में भी ऐसे ही हमलों की गंभीर चेतावनी जारी हुई। वहां लगातार चार दिनों तक जनजीवन ठप रहा। सारे किंडरगार्टन और शिक्षा संस्थान, मेट्रो रेलसेवा और व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रहे। पेरिस हमलों के कम से कम तीन आतंकवादी ब्रसेल्स से ही आए थे। इसलिए फ्रांस में ही नहीं, पूरे यूरोप में कहा जा रहा है कि ब्रसेल्स अब यूरोप में इस्लामी आतंकवाद की राजधानी बन गया है।

फ्रांस में हुए आतंकी हमले ने यूरोप में आतंकवाद की बहस को नई दिशा दी है। समझा जाता है कि 9/11 की घटना के बाद मुस्लिम देशों के आतंकवादियों ने यूरोप को निशाना बनाया है। लेकिन यूरोप दशकों से अपने ही देशों के आतंकवादी संगठनों से जूझ रहा है। यूरोपीय देशों में दर्जनभर से ज्यादा आतंकी संगठन हैं।

यूरोप विशेषकर फ्रांस इन दिनों बढ़ते जातीय व सामाजिक तनाव का सामना कर रहा है, जो कि बहुत जल्द ठीक होता दिखाई नहीं देता। इन सबके बीच, उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व से अनेकानेक शरणार्थी, ज्यादातर सीरिया गृह युद्ध से भागे लोग यहां आकर पनाह ले रहे हैं। यूरोप आतंकवाद और शरणार्थी समस्या के इस डबल-पंच के खिलाफ निस्सहाय दिख रहा है।

यूरोप में जहां कहीं भी अरब व इस्लामी जगत से आए लोग बड़ी संख्या में बस गए, वहां उनकी पहली पीढ़ी ही नहीं, बाद वाली पीढ़ियां भी स्थानीय समाज से परे रहना ही पसंद करती हैं। उन्हें लगता है कि स्थानीय समाज में घुलने-मिलने से उनकी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान के रंग पर स्थानीय समाज का रंग चढ़ने लगेगा। उन्मुक्त जीवन-शैली और लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था वाला स्थानीय ईसाई समाज उनकी नजर में भोग-विलास और स्वच्छंद स्त्री-पुरुष संबंधों वाला एक 'पतित समाज' है। उचित यही है कि वे उसे दूर से ही हाथ जोड़ लें।

अपनी अलग मानसिकता और धार्मिक संस्कारों की शाश्वतता पर कुछ ज्यादा ही ज़ोर देने का परिणाम है कि फ्रांस ही नहीं, अन्य यूरोपीय देशों के मूल निवासी भी मुसलमानों से कतराने लगे हैं। दोनों ओर एक-दूसरे के प्रति अविश्वास और पूर्वाग्रह पनपने लगे हैं। यूरोप, उत्तरी अमेरिका और पूर्व एशिया में मुसलमानों की छवि आतंकवादी के रूप में कैद हो गई है, और "रूढ़िवादी", "अतिवादी" या "आधुनिकता-विरोधी" का लेबल दिया जाने लगा है।

यूरोपीय अधिकारियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि मुस्लिम प्रवासियों को आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में कैसे मिलाया जाए, ताकि जातीय तनावों से उत्पन्न सामाजिक टकराव को समाप्त किया जा सके। लेकिन उसके लिए, यूरोप सिद्धांतों के बिना स्वतंत्रता की वकालत नहीं कर सकता है।

चूंकि आतंकवाद सार्वजनिक सुरक्षा और मानवीय मूल्यों के लिए खतरा है, इसलिए यूरोपीय निर्णय-निर्माताओं को सोचना होगा कि "खतरनाक रोगों का इलाज खतरनाक उपचार से ही होना चाहिए।" सार्वजनिक नीति में, यूरोप को अपनी "कल्याण नीति" पर पुनर्विचार करना और कुछ समुदायों के बीच "जीने के लिए काम" के शासन को बढ़ावा देने पर विचार करना चाहिए। आतंकवाद पैदा करने वाली मिट्टी को साफ करने के लिए, यूरोपीय सरकारों को भी प्रवासी आबादी के बीच आधुनिक मूल्यों का प्रसार करने के लिए गहन कदम उठाने चाहिए।
(अखिल पाराशर, चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)