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क्या संरक्षणवाद भारत को अच्छा बनाएगा

भारतीय अखबार बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार हालांकि भारत सरकार ने वैश्वीकरण और व्यापारिक सहयोग का समर्थन करने की बात कही है, लेकिन पिछले कुछ सालों में भारत संरक्षणवाद की ओर बढ़ रहा है। सरकार द्वारा जारी बजट के अनुसार भारत व्यापक तौर पर आयात शुल्क बढ़ाएगा। 1991 में खुलेपन की शुरुआत के बाद ऐसा कभी नहीं हुआ है।

सरकार का मानना है कि भारत बड़ी जनसंख्या वाला देश है, उसकी श्रम शक्ति और बाजार भी विशाल है। पर्याप्त श्रम शक्ति से रोजगार मुश्किल से मिलता है। अब भारत में निर्माण उद्योग का स्तर इतना ऊंचा नहीं है, इसलिए अन्य देश, विशेषकर चीन का प्रभाव पड़ेगा।

वास्तव में हाल में भारत सरकार के कदमों का निशाना चीन है। 24 नवंबर को भारत के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने फिर एक बाद 43 चीनी एप्स पर बैन लगाने की घोषणा की और कहा कि यह राष्ट्रीय प्रभुसत्ता और सुरक्षा के लिए है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या संरक्षणवाद भारत को अच्छा बनाएगा?

15 नवंबर को आसियान के दस देशों, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड समेत 15 देशों ने दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार समझौता आरसीईपी संपन्न किया। लेकिन भारत ने अंततः इससे हटने का फैसला किया। भारतीय राजनीतिज्ञों ने सफाई दी कि आरसीईपी भारत को नुकसान पहुंचाएगा।

लेकिन तथ्यों से साबित हुआ है कि बंद द्वार से भारत को और बड़ा नुकसान पहुंचेगा। इससे पहले भारत ने विदेशी निवेश नीति मजबूत की। पड़ोसी देशों के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को भारत सरकार की मंजूरी मिलनी है। अलीबाबा समेत कई चीनी मुख्य कंपनियों ने कहा कि हाल में भारतीय कंपनियों के साथ नया व्यापार करने की संभावना नहीं दिख रही है। अन्य चीनी निवेशकों ने भी भारत में पूंजी समाप्त की। इससे भारत के पूंजी बाजार को झटका लगा है।

आरसीईपी की बात करें, अगर भारत इसमें शामिल होता है, तो उदार नीति के सहारे भारतीय लोगों को और सस्ते में चीनी उत्पाद मिलेंगे, लेकिन अब यह मौका भारतीयों के हाथों से निकल चुका है। क्या भविष्य में भारत आरसीईपी में वापस आएगा, हम प्रतीक्षा करेंगे।
(साभार---चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)


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