Hukamnama

हुक्मनामा श्री हरमंदिर साहिब जी 11 फरवरी

सोरठि महला ५ ॥ गुण गावहु पूरन अबिनासी काम क्रोध बिखुजारे ॥ महा बिखमु अगनि को सागरु साधूसंगि उधारे ॥१॥ पूरै गुरि मेटिओ भरमुअंधेरा ॥ भजु प्रेम भगति प्रभु नेरा ॥ रहाउ॥ हरि हरि नामु निधान रसु पीआ मन तनरहे अघाई ॥ जत कत पूरि रहिओ परमेसरुकत आवै कत जाई ॥२॥

हे भाई! पूरे गुरु की सरन आ कर) सर्बव्यापक नास रहित प्रभु के गुण गया कर।(जो मनुख यह उदम करता है गुरु उस केअंदर से आत्मिक मौत लाने वाले) काम क्रोध(आदि का) जहर जला देता है। (यह जगतविकारों की) आग का समुंदर (है, इस में सेपार निकलना) बहुत कठिन है (सिफत-सलाह के गीत गाने वाले मनुख को गुरु)साध सांगत में (रख के, इस सागर से) पारनिकल देता है॥१॥ (हे भाई! पूरे गुरु कीसरन पड़। जो मनुख पूरे गुरु की सरन पड़ा)पूरे गुरु ने (उस का) भ्रम मिटा दिया, (उस कामाया के मोह का) अन्धकार दूर कर दिया।(हे भाई! तुन भी गुरु की सरन आ के) प्रेमभरी भक्ति से प्रभु का भजन कर, (tujhe) प्रभुअंग-संग (दिखाई पड़ेगा)॥रहाउ॥ हे भाई!परमात्मा का नाम (सारे रसों का खज़ाना है,जो मनुख गुरु की सरन आ के इस) खजानेका रस पिता है, उस का मन उस का तन(माया के रसों से) भर जाता है। उस को हरजगह परमात्मा व्यापक दिख जाता है। वःमनुख फिर न पैदा होता है न ही मरता है॥२॥