हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 3 जुलाई

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रामकली महला ५ ॥ रैणि दिनसु जपउ हरि नाउ ॥ आगै दरगह पावउ थाउ ॥ सदा अनंदु न होवी सोगु ॥ कबहू न बिआपै हउमै रोगु ॥१॥ खोजहु संतहु हरि ब्रहम गिआनी ॥ बिसमन बिसम भए बिसमादा परम गति पावहि हरि सिमरि परानी ॥१॥ रहाउ ॥ गनि मिनि देखहु सगल बीचारि ॥ नाम बिना को सकै न तारि ॥ सगल उपाव न चालहि संगि ॥ भवजलु तरीऐ प्रभ कै रंगि ॥२॥ देही धोइ न उतरै मैलु ॥ हउमै बिआपै दुबिधा फैलु ॥ हरि हरि अउखधु जो जनु खाइ ॥ ता का रोगु सगल मिटि जाइ ॥३॥ करि किरपा पारब्रहम दइआल ॥ मन ते कबहु न बिसरु गोपाल ॥ तेरे दास की होवा धूरि ॥ नानक की प्रभ सरधा पूरि ॥४॥२२॥३३॥

अर्थ :- (हे भगवान ! कृपा कर) मैं दिन रात हरि-नाम जपता रहूँ, (और इस तरह) परलोक में तेरी हजूरी में जगह प्राप्त कर लूं। (जो मनुख नाम जपता है, उस को) सदा आनंद बना रहता है, कभी उस को चिंता नहीं सताती; हऊमै का रोग कभी उसके ऊपर अपना जोर नहीं डाल सकता।1। भगवान के साथ गहरी साँझ रखने वाले हे संत जनो ! सदा परमात्मा की खोज करते रहो। हे प्राणी ! (सदा) परमात्मा का सुमिरन करता रह; (सुमिरन की बरकत के साथ) बड़ी ही हैरान करने वाली आश्चर्ज आत्मिक अवस्था बन जाएगी, तूं सब से ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेगा।1।रहाउ। हे संत जनो ! सारे ध्यान के साथ भली प्रकार विचार के देख लो, परमात्मा के नाम के बिना ओर कोई भी (संसार-सागर से) पार नहीं निकाल सकता। (नाम के बिना) ओर अन्य उपाए (मनुख के) के साथ नहीं जाते (सहायता नहीं करते)। भगवान के प्रेम-रंग में रंगे रहने से ही संसार-सागर से पार निकल सकते है।2। (हे संत जनो ! तीर्थ आदिक और) शरीर को धोने से (मन की विकारों वाली) मैल दूर नहीं होती, (बलिक यह) हऊमै अपना दबाव डाल लेती है (कि मैं तीर्थों के स्नान कर आया हूँ। मनुख के अंदर) से और बाहर से अहंकार का पसारा पसर जाता है (मनुख पखंडी हो जाता है)। हे संत जनो ! जो मनुख परमात्मा के नाम की दवाई खाता है, उस का सारा (मानसिक) रोग दूर हो जाता है।3। हे पारब्रह्म ! हे दया के घर ! (मेरे ऊपर) कृपा कर। हे गोपाल ! तूं मेरे मन से कभी भी ना विसर। गुरू नानक जी कहते हैं, हे भगवान ! मैं तेरे दासो के चरणों की धूल बना रहूँ- मुझ नानक की यह चाह पूरी कर।4।22।33।