हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 5 जुलाई

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सलोक मः ३ ॥ अंदरि कपटु सदा दुखु है मनमुख धिआनु न लागै॥ दुख विचि कार कमावणी दुखु वरतै दुखु आगै ॥ करमी सतिगुरु भेटीऐ ता सचि नामि लिव लागै ॥ नानक सहजे सुखु होइ अंदरहु भ्रमु भउ भागै ॥१॥ मः ३॥ गुरमुखि सदा हरि रंगु है हरि का नाउ मनि भाइआ ॥ गुरमुखि वेखणु बोलणा नामु जपत सुखु पाइआ ॥ नानक गुरमुखि गिआनु प्रगासिआ तिमर अगिआनु अंधेरु चुकाइआ ॥२॥

हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुख के मन में खोट टिका रहता है (इस कारन उस को) सदा (आत्मिक) कलेश रहता है, उस की सुरत (परमात्मा में) नहीं जुडती। उस मनुख की साड़ी किर्त-कार दुःख-कलेश में ही होती है (हर समय उस को) कलेश ही रहता है, परलोक में भी उस के लिए कलेश ही है। (जब परमात्मा की) कृपा से (मनुख को) गुरु मिलता है तब सदा-थिर हरी-नाम में उस की लगन लग जाती है। हे नानक! आत्मिक अदोलता में (टिकने के कारन उस को आत्मिक) आनंद मिला रहता है और उस के मन में से भटकन दूर हो जाती है सहम दूर हो जाता है॥१॥ हे भाई! जो मनुख गुरु के सन्मुख रहता है (उस के अंदर) सदा परमात्मा के नाम की रंगत छड़ी रहती है, उस को परमात्मा का नाम (अपने) मन में प्यारा लगने लग जाता है। (वः मनुख हर समय परमात्मा को ही) देखता है (सदा परमात्मा का) नाम ही उच्चारता है, नाम जपते हुए उस को आत्मिक आनंद मिलता है॥2॥