सत्ता मिली है तो लोगों का काम करो, पहचान खुद-ब-खुद बन जाएगी

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शिमला : मानसून सत्र के पहले दिन भाजपा विधायक अनिल शर्मा अपने स्व. पिता पंडित सुखराम को याद कर भावुक हो गए। मानसून सत्र के पहले दिन सदन के दिवंगत सदस्यों स्व. पंडित सुखराम, प्रवीण शर्मा, मस्त राम व रूप सिंह चौहान को श्रद्धांजलि दी गई। विधायक अनिल शर्मा स्व. पंडित सुखराम के पुत्र हैं। विधान सभा के चारों पूर्व सदस्यों को श्रद्धांजलि देते हुए अनिल शर्मा ने स्व. पंडित सुखराम के राजनीतिक दर्शन को सदन में रखा। उन्होंने देश व प्रदेश के विकास के लिए पंडित सुखराम के योगदान को याद किया। साथ ही उन्होंने पंडित सुखराम के राजनीतिक जीवन के उतार चढ़ावों, उनके हिविका के गठन, प्रो. प्रेम कुमार धूमल के नेृत्व वाली भाजपा सरकार को हिविका के गठन के साथ साथ 1993 में शिमला में कांग्रेस के भीतर सत्ता के लिए हुए जद्दोजहद का जिक्र भी किया। इससे पहले कांग्रेस के विक्रमादित्य सिंह, भाजपा के राकेश ज वाल व हीरा लाल ने भी सदन में दिवंत विधायकों को श्रद्धांजलि दी।

अनिल शर्मा ने कहा कि पंडित सुखराम ने 1962 में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा। चुनाव में उनका चुनाव चिन्ह शेर था। वह शेर की तरह की राजनीतिक जंग लड़ते रहे। उन्होंने कहा कि मंडी की जनता में पंडित सुखराम की पकड़ सिर्फ उनकी राजनीतिक सेवा की वजह से ही बन सकी। पंडित सुखराम के राजनीतिक जीवन में झांकते हुए उन्होंने कहा कि 1985 में पंडित सुखराम को लोक सभा चुनाव लड़वाया गया। इससे पहले वह प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुके थे। बतौर मंत्री उन्होंने लोगों की सेवा की, नतीजतन 1985 में उन्होंने एक कांग्रेस कार्यकर्ता को टिकट दिलवाया तथा चुनाव भी जितवाया। 1993 में अनिल शर्मा को पंडित सुखराम ने चुनाव लड़ने को कहा। इच्छा के विपरीत अनिल चुनाव में कूदे तथा जीत गए। इसी साल हिमाचल में कांग्रेस में सत्ता के लिए संघर्ष भी हुआ। उन्होंने कहा कि इसके बाद केंद्र में संचार मंत्री रहते हुए पंडित सुखराम ने देश व प्रदेश में संचार क्रांति का सूत्रपात किया। इसी दौर में पंडित सुखराम के परिवार पर विपदा आई तथा उन्होंने हिविका का गठन किया। हिविका विधायकों को भाजपा में शामिल करवाने का मास्टर स्ट्रोक उन्होंने खेला तथा प्रो. धूमल की सरकार बनी।