कैसे पैदा हुआ थाईवान सवाल

फिलहाल थाईवान मुद्दे को लेकर चीन और अमेरिका के बीच मुकाबला काफी तेज हुआ है ।थाईवान जलडमरूमध्य की स्थिति व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर खींच रही है । आखिर थाईवान सवाल कैसे पैदा हुआ और उसका मर्म क्या है ।आज हम इसकी चर्चा करेंगे । प्राचीन समय से थाईवान चीन के अधीन रहा है ।चीन की ऐतिहासिक पुस्तकों में थाईवान के बारे में विश्व का सबसे पुराना रिकार्ड दर्ज है ।एक हजार वर्ष के पहले चीन के सुंग राजवंश और युआन राजवंश ने थाईवान का प्रशासनिक प्रबंधन शुरू किया ।वर्ष 1894 में जापान ने तत्कालीन चीन के छिंग राजवंश के खिलाफ युद्ध छेड़ा ।

दूसरे साल जापान ने युद्ध जीत कर थाईवान को छिंग राजवंश से अपने नियंत्रण में कर लिया ।वर्ष 1945 में दूसरे विश्व युद्ध के बाद काहिरा घोषणा और पोस्टडाम विज्ञप्ति समेत अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रभाव संपन्न दस्तावेजों के मुताबिक चीन जापानी अतिक्रमणकारियों से थाईवान को वापस लाया ।तत्कालीन चीन सरकार ने थाईवान पर प्रभुसत्ता की बहाली की घोषणा की । वर्ष 1946 में चीन में गृह युद्ध हुआ ।वर्ष 1949 में क्वोमिनतांग (नेशनललिस्ट पार्टी)सरकार को गृह युद्ध में करारी हार मिली और उसकी बची खुची शक्ति थाईवान में चली गयी। 1 अक्तूबर 1949 को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के नेतृत्व में चीन लोक गणराज्य की केंद्रीय सरकार औपचारिक रूप से स्थापित हुई ,जो क्वोमिनतांग सरकार की जगह लेकर समग्र चीन का प्रतिनिधित्व करने वाली एकमात्र कानूनी सरकार बनी ।

उस समय सीपीसी केंद्रीय कमेटी ने थाईवान को मुक्त करने का नारा भी पेश किया । पर शीतयुद्ध में पश्चिमी जगत के प्रमुख स्थान को मजबूत करने के लिए अमेरिका ने थाईवान मामले में अपनी टांग अड़ायी ।राष्ट्रपति हेनरी ट्रुमेन ने चीनी जन मुक्ति सेना(पीएलए) को थाईवान को मुक्त करने से रोकने के लिए नौसेना की सातवीं टुकड़ी को थाईवान जलडमरूमध्य भेजा ।अमेरिका ने थाईवान भाग चुकी क्वोमिनतांग सरकार के साथ तथाकथित समान सुरक्षा संधि संपन्न की ,जिससे थाईवान सवाल अधिक जटिल हो गया। उपरोक्त ऐतिहासिक घटनाक्रम से जाहिर है कि थाईवान मुद्दा चीन के गृहयुद्ध से छोड़ा गया एक सवाल है। जिसका मतलब है कि यह चीन का अंदरूनी मामला है।

इसके साथ वह शुरू से ही अमेरिका का चीन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर चीन की प्रभुसत्ता व प्रादेशिक अखंडता का गंभीर उल्लंघन करने और चीन के एकीकरण को रोकने का षड्यंत्र भी है। अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति के परिवर्तन के साथ पिछली सदी के 70 वाले दशक में चीन अमेरिका संबंधों में सुधार शुरू हुआ ।फरवरी 1972 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने चीन की यात्रा की ।दोनों पक्षों ने शांगहाई में संयुक्त विज्ञप्ति जारी की ,जिसमें अमेरिका ने साफ कहा कि थाईवान चीन का एक भाग है ।अमेरिका सरकार को इस पर आपत्ति नहीं है ।दिसंबर 1978 में चीन और अमेरिका ने राजनयिक संबंध की स्थापना की संयुक्त विज्ञप्ति जारी की ,जिसमें अमेरिका ने माना कि चीन लोक गणराज्य चीन की एकमात्र कानूनी सरकार है और थाईवान चीन का एक हिस्सा है।

लेकिन थाईवान सवाल पर अमेरिका हमेशा दोहरा चेहरा दिखाता है और निरंतर थाईवान मसले का उपयोग कर अपना लाभ पाना चाहता है। हाल ही में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की अध्यक्ष नैन्सी पेलोसी की थाईवान यात्रा इसका एक ताजा उदाहरण है । अमेरिका की दखलंदाजी के कारण 70 से अधिक वर्षो में थाईवान जलडमरूमध्य के दोनों तट अलग रहे ।चीन की मुख्य भूमि और थाईवान क्षेत्र अलग-अलग विकास रास्ते पर चले ।कई ऐतिसाहिक और वास्तविक कारणों से दोनों तटों के संबंधों में अनेक मतभेद मौजूद हैं ,पर आम परिवृत्ति आदान-प्रदान व मिश्रण वाली है और मुख्य धारा एकीकरण का समर्थन है ।

चीनी राष्ट्र के 5 हजार वर्षों के विकास में एकीकरण का अनुसरण तथा विभाजन का विरोध हमेशा समग्र राष्ट्र का मुख्य धारा वाला मूल्य दर्शन रहा है । परिस्थिति के परिवर्तन के साथ-साथ थाईवान के प्रति मुख्य भूमि की नीति थाईवान की मुक्ति करने से शांतिपूर्ण पुनरेकीकरण तथा एक देश ,दो व्यवस्थाओं के रूप में भी बदल गयी । सीपीसी के नेतृत्व में चीन की मुख्य भूमि ने आधुनिक निर्माण में असाधारण उपलब्धियां प्राप्त की हैं और चीनी राष्ट्र के महान पुनरुत्थान का उज्जवल भविष्य नजर आ रहा है ।इस संदर्भ से देखा जाए ,तो थाईवान सवाल निश्चय ही राष्ट्रीय पुनरुत्थान के साथ सुलझाया जा सकेगा ।यह एक अपरिहार्य ऐतिहासिक रूझान है ।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप , पेइचिंग)