स्वच्छ ऊर्जा के माध्यम से जलवायु परिवर्तन का मुकाबले करने में चीन का योगदान

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फिलहाल हमारे सामने यह मीडिया रिपोर्ट आई है कि आल्प्स पर्वत के करीब 1500 ग्लेशियरों में से आधा हिस्सा, यानी कि लगभग 700 से अधिक ग्लेशियर अगले 30 वर्षों में गायब हो सकते हैं। हालांकि इधर के कई वर्षों में ग्लेशियरों के पिघलने की इसी तरह की अनेक खबरें आई हैं, फिर भी इसके पीछे छुपे हुए जलवायु परिवर्तन का संकट हमें चिंतित करता है, जो हमें इसपर विशेष ध्यान देने और ज़ल्द से ज़ल्द इससे निपटने की ज़रूरत है। चूंकि जलवायु परिवर्तन से सीधे ग्लोबल वार्मिंग की ओर ले जाता है, जिसकी वजह से आर्कटिक, अंटार्कटिका, हिमालय और यूरोप जैसे क्षेत्रों में ग्लेशियरों के धीरे-धीरे पिघलने लगते हैं। साथ ही, बढ़ते तापमान से मौसम का मिजाज बदल रहा है और प्रकृति का संतुलन भी बिगड़ रहा है।

इधर के वर्षों में विश्व भर में चरम मौसम की वृद्धि, भयंकर सूखा, ये सब जलवायु परिवर्तन का परिणाम माना जा रहा है। जिससे पृथ्वी पर मनुष्यों और अन्य जीवों के लिए कई जोखिम पैदा हो रहे हैं। उधर, जलवायु परिवर्तन के खतरों के बारे में वैज्ञानिक लगातार आगाह करते आ रहे हैं। स्रोत पर वापस जाएं, तो जलवायु की दशाओं में यह बदलाव प्राकृतिक भी हो सकता है और मानव के क्रियाकलापों का परिणाम भी हो सकता है। लेकिन अनुसंधान से पता चलता है कि ग्रीनहाउस प्रभाव और वैश्विक तापन को मनुष्य की क्रियाओं का परिणाम माना जा रहा है, जो औद्योगिक क्रांति कार्बन डाई आक्साइड आदि गैसों के वायुमण्डल में अधिक मात्रा में बढ़ जाने का परिणाम होता है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि जलवायु परिवर्तन की समस्या दिन-प्रति-दिन गंभीर होती जा रही है और मनुष्यों पर प्रभाव भी बढ़ रहा है।

इन मुद्दों को देखते हुए इधर के 20 से अधिक वर्षों में संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन और कोपेनहेगन जलवायु सम्मेलन समेत श्रृंखला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजन किया गया है और आने वाले समय में भी इनका आयोजन जारी रखेगा। इन सम्मेलनों का उद्देशय यह है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन से कैसे निपटें। सम्मेलनों में तमाम देशों के लिये कार्बन उत्सर्जन को कम करने का लक्ष्य भी बनाया गया है। इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिये चीन और भारत समेत तमाम देशों ने अपनी योजना बनायी है। ऐसा कहा जा सकता है कि हर देश की इस योजना में स्वच्छ ऊर्जा को एक खास महत्व दिया जाता है। स्वच्छ ऊर्जा, वह ऊर्जा स्रोत है जिससे कार्बन उत्सर्जन नहीं होता है। स्वच्छ ऊर्जा का तात्पर्य ऐसी ऊर्जा उत्पादन प्रक्रिया से हैं जिससे जलवायु पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है।

जैसे कि सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा से प्राप्त ऊर्जा इत्यादि स्वच्छ ऊर्जा के रूप में कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रण करने में सक्षम हैं। इन्हें नवीकरणीय ऊर्जा भी कहा जाता है। यदि हम चीन और भारत के बारे में बात करें, तो इधर के वर्षों में चीन और भारत, दोनों देश ही पारिस्थितिक संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से मुकाबला में खास महत्व देते हुए इस दिशा में काम करने के लिये प्रयास कर रहे हैं। अपने आर्थिक विकास और लोगों की आजीविका में सुधार करने के साथ साथ जलवायु परिवर्तन पर सक्रिय रूप से प्रतिक्रिया देना चीन और भारत, दो सबसे बड़े आबादी वाले और विकासशील देशों के सामने एक आम चुनौती बनी हुई है। दूसरी तरफ़ से यह दोनों देशों के बीच सहयोग का एक नया फोकस भी बन गया है।

चीनी राष्ट्रीय ऊर्जा प्रशासन के आंकड़ों के मुताबिक चीन में कोयले की खपत का अनुपात वर्ष 2014 में 65.8% से गिरकर वर्ष 2021 में 56% तक पहुंच गया। साथ ही, इसी अवधि में स्वच्छ ऊर्जा खपत का अनुपात 16.9% से बढ़कर 25.5% तक पहुंच गया। प्रासंगिक नीतियों के माध्यम से नई ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहित करने के साथ- साथ चीन स्वच्छ ऊर्जा उपकरणों का विकास और सुधार भी करता रहता है। 2022 विश्व स्वच्छ ऊर्जा उपकरण सम्मेलन भी चीन द्वारा उठाए गए कदमों में से एक माना जाता है। इस सम्मेलन का आयोजन 27 से 29 अगस्त को दक्षिण पश्चिम चीन के सछ्वान प्रांत के तेयांग शहर में किया जाएगा।

सम्मेलन में कई बैठकों और संगोष्ठियों का आयोजन किया जाएगा, जिनका उद्देश्य ऊर्जा उपकरणों के निर्माण में मौजूद गर्म मुद्दों पर चर्चा करना, स्वच्छ ऊर्जा उपकरणों के लिए रणनीतियों का अध्ययन करना और ऊर्जा उद्योग के हरित नवाचार और विकास में सहायता देना है। साथ ही, सम्मेलन में विश्व स्वच्छ ऊर्जा उपकरण प्रदर्शनी समेत अन्य कई गतिविधियां भी आयोजित होगी, जिससे स्वच्छ ऊर्जा के विकास और जलवायु परिवर्तन के मुकाबले में चीन के अनुभवों को साझा किया जा सकेगा और चीन की बुद्धिमान का योगदान दिया जा सकेगा। (लेखक:ल्याओ चियोंग, चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)