एससीओ शिखर सम्मेलन – चीन-भारत सहयोग का नया अवसर

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शांघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ का शिखर सम्मेलन 15 से 16 सितंबर तक उज्बेकिस्तान के प्राचीन नगर समरकंद में आयोजित होगा। खबर है कि मौके पर चीन और भारत के नेता उपस्थित होंगे और दोनों के बीच वार्तालाप करने की उम्मीद भी है। पिछले वर्ष में हुए परिवर्तनों से क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्थितियों में एससीओ के अद्वितीय महत्व दर्शाया जाता है। उधर चीन और भारत दोनों एससीओ के सदस्य हैं, वर्तमान शिखर सम्मेलन के आयोजन से दोनों देशों के लिए मैत्रीपूर्ण सहयोग करने का नया अवसर तैयार है।

समरकंद प्राचीन काल के सिल्क रोड पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। प्राचीन काल में मशहूर साधु ह्वानसांग ने अपनी भारत के लिए यात्रा के दौरान इस नगर पर अपना पांव रखा था। लंबे वर्षों में, अनगिनत भिक्षु, व्यापारी और विद्वान आदि चीन, मध्य एशिया, भारत और अन्य देशों को जोड़ने वाले इस प्राचीन मार्ग से गुजरे हुए थे। प्राचीन समय में जब यातायात की सुविधा नहीं थी, लोग आपसी आदान-प्रदान के लिए अनगिनत कठियाइयों को दूर करने में सक्षम थे। आज के लोग आपस में मैत्रीपूर्ण सहयोग करने का पर्याप्त कारण भी होता है। आज दुनिया भर अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय हॉटस्पॉट मुद्दे एक के बाद एक उभर रहे हैं। राजनीतिक अस्थिरता और अनिश्चितता अधिक तीव्र बन गई है। ऐसी स्थितियों में एससीओ को भी नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। हालांकि, एससीओ के सदस्य देशों के बीच सहयोग करने की आवश्यकता भी प्रबल है। विशेष रूप से पिछले एक साल में, अंतरराष्ट्रीय हॉटस्पॉट मुद्दों के प्रति, एससीओ के सदस्यों ने संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिम के आदेश का पालन करने के बजाय, अपना अपना स्वतंत्र रुख अपनाया। जिससे यह जाहिर है कि एससीओ के सदस्यों को आपस में पारस्परिक विश्वास को बढ़ाने और एक दूसरे के हितों की रक्षा करने की तीव्र इच्छा मौजूद है।

एससीओ में दो सबसे अधिक आबादी वाले देशों के रूप में, चीन और भारत के बीच सहयोग न केवल क्षेत्रीय शांति और स्थिरता से संबंधित है, बल्कि संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। हालांकि सीमा जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच कुछ मतभेद हैं, सीमा के पश्चिमी क्षेत्र के ज्यादातर स्थानों पर दोनों के सशस्त्र बलों को हटाया गया है। और सीमांत क्षेत्रों की स्थिति आम तौर पर स्थिर है। जिससे सहयोग के विस्तार के लिए आधार तैयार है। 2021 में, चीन-भारत व्यापार की मात्रा पहली बार 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर से पार कर 125 बिलियन तक पहुंच गई। इस वर्ष की पहली छमाही में, चीन-भारत व्यापार मात्रा 67.08 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई है, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 16.5% की वृद्धि है। वार्षिक व्यापार मात्रा पिछले वर्ष के स्तर से अधिक होने की उम्मीद भी है। हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार में असंतुलन होने की सवाल भी है, पर इसका समायोजन करने वाले उपाय जारी हैं। विश्वास है कि महामारी के अंत के बाद जब सभी देशों की अर्थव्यवस्थाएं पूरी तरह से ठीक हो जाएंगी, तब चीन और भारत निश्चित रूप से व्यापार करने के और अधिक चैनल खोलेंगे। 

एससीओ नाटो के जैसे एक सैन्य गठबंधन नहीं है। उधर एससीओ आजीविका को बढ़ावा देने, अंतरराष्ट्रीय उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा बनाए रखने, अंतरराष्ट्रीय खाद्य एवं ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता को बढ़ावा देने, और गैर-पारंपरिक सुरक्षा की धमकी का सामना करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एससीओ मंच की मदद से, चीन और भारत बहुपक्षवाद को बढ़ावा देने, मानव जाति के सामान्य मूल्यों की वकालत करने, अवैध एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध करने और उभरते बाजारों के सामान्य हितों की रक्षा करने में हमेशा एक ही आवाज में बोलते हैं। यह न केवल एससीओ की समानता और सहिष्णुता की “शंघाई भावना” को प्रदर्शित करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर दोनों का समान रुख और हित भी है।

वर्तमान में, एससीओ के 8 सदस्य देश, 4 पर्यवेक्षक देश और 9 संवाद भागीदार हैं। साथ ही, कम से कम 10 देश एससीओ में शामिल होना चाहते हैं या संगठन के भीतर अपने स्थान को उन्नत करना चाहते हैं। उधर चीन और भारत की जनसंख्या दुनिया का लगभग 40% हिस्सा रहती है। एससीओ के ढांचे के तहत, सभी सदस्य जीत-जीत सहयोग की राह पर काम करने का प्रयास कर रहे हैं। विशेष रूप से वर्तमान अंतरराष्ट्रीय स्थिति के तहत, एससीओ ढांचे के भीतर ब्रिक्स बैंक के जैसे एक वित्तीय सहयोग तंत्र की स्थापना करने से निस्संदेह सभी सदस्य देशों के हित में है। और इसी संबंध में, चीन और भारत के बीच घनिष्ठ सहयोग करने की नींव है।

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)