सबसे बड़ा तीर्थ स्थान प्रयागराजः एक बार की यात्रा से मिलेगा चार धाम जैसा फल, गंगा पश्चिमी वाहिनी में स्नान करने से होगी मोक्ष की प्राप्ती

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प्रयागराज सबसे बड़ा तीर्थ है। इस अभिमत के लाखों लोग हैं। अवधारणाएं भिन्न भिन्न हो सकती हैं मगर तीर्थों का छोटा बड़ा कद अपनी-अपनी दृढ़ आस्था एवं विश्वास का विषय है। खैर जो भी हो, यह शाश्वत सत्य है कि प्रयाग हिंदुओं का महातीर्थ अवश्य है। जीवन में मनुष्य को एक बार प्रयाग की यात्र अवश्य करनी चाहिए। प्राकृतिक योग से यहां गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का मेल होता है। हालांकि सरस्वती नदी तो अदृश्य रूप में बहती है मगर गंगा, यमुना प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देती हैं। कभी-कभी तो सर्दी और गर्मी के मौसमों में गंगा और यमुना के मेल का स्रानार्थी को स्पष्ट आभास भी होता है।

गर्मी की ऋतु में गंगा की ठंडी लहरें जहां सुखद अहसास कराती हैं वहीं यमुना की लहरें उष्णता का बोध कराती हैं। सर्दी की ऋतु में जहां यमुना की लहरें कम ठंडक से दिल को सुकून पहुंचाती हैं वहीं गंगा की लहरें बर्फीला अहसास कराती हैं। सरस्वती नदी का पानी कहां से आता है, किस रूप में वह दोनों नदियों के पानी में मिल जाता है यह शोध का विषय है। बहरहाल, हिंदुओं की दृढ़ आस्था का यह नदियों का मेल लाखों श्रद्धालुओं को प्रतिवर्ष अपनी ओर आस्था और विश्वास के साथ खींच लाता है।

ये लाखों श्रद्धालु बरबस पुण्य पद की प्राप्ति हेतु प्रयागराज की गोद में डुबकियां लगाते हुए देखे जा सकते हैं। प्रयाग वह स्थान है जहां प्रतिदिन भेर की बेला से सूर्यास्त तक धार्मिक क्रियाएं सम्पादित होती रहती हैं। आलेख लेखक पवनकुमार कल्ला ने तीनों नदियों के इस मेल स्थल पर जब डुबकियां लगाई तब यह देखा कि तीनों नदियों का यह पानी साफ-सुथरा व स्वच्छ है। हालांकि पानी की गहराई चार-पांच फुट अवश्य है मगर उसमें गिरा हुआ सिक्का भी ऊपर से स्पष्ट दिखाई देता है। इतना निर्मल व स्वच्छ पानी कहीं-कहीं देखने को मिलता है। तीनों नदियों के मेल स्थल पर नावों द्वारा सफर तय किया जाता है।

पश्चात पंडों द्वारा बनाए गए अस्थाई लकड़ी व पीपों आदि के छोटे-छोटे पुलों द्वारा भक्तगण को पानी में नीचे उतरकर स्नान करने हेतु प्रेरित किया जाता है। हालांकि पानी की गहराई पूर्व में लेखक द्वारा चार-पांच फुट ही बताई गई है मगर लकड़ी के रोपे हुए खंबो को पकड़ कर जब अस्थाई पुलों पर यात्रियों को स्नान कराया जाता है तब ऐसा महसूस होता है कि यहां पानी की गहराई पांच फुट से अधिक है। तीनों नदियों का यह मेल स्थल प्रयागराज के नाम से जाना जाता है। जो हिंदुओं का प्राचीनतम तीर्थ है।

ऋग्वेद दशम् मंडल की एक ऋचा में यह उल्लेख मिलता है कि जहां श्वेत व श्यामवर्ण की दो नदियों का मेल होता है और उस स्थान पर जो मनुष्य स्नान करते हैं वो स्वर्ग को प्राप्त होते हैं और उसी के साथ यह उल्लेखित है कि इन नदियों के मेल स्थल पर जो मनुष्य अपनी देह का त्याग करता है वह सभी बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष का भागी होता है। माघ मास में प्रयागराज तीर्थ में कल्पवास करने का बड़ा महत्व है। कल्पवास का अर्थ यह है कि माघ मास में पूरे महीने रहकर प्रतिदिन तीर्थ स्रान किया जाए। ऐसा हजारों लोग करते हैं।

इस कारण से माघ महीने में प्रयागराज तीर्थ में बड़ा भारी मेला भरता है। मेले में जनसमूह की संख्या इतनी होती है कि सरकार के द्वारा मेले की प्रशासनिक व्यवस्था अपने हाथ में ली जाती है। अग्नि पुराण, पदम पुराण, कर्म पुराण, मत्स्य पुराण, गरुड़ पुराण, महाभारत तथा वेदों में तीर्थराज प्रयाग का प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष महत्त्व प्रतिपादित हुआ है। आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य प्रयाग तीर्थ पधारे थे और उन्होंने इस अवसर पर साधु संतों को एकजुट होकर अखाड़े इत्यादि बनाकर शाही स्नान करने की सलाह दी थी।

महाभारत के आदि पर्व में प्रयागराज तीर्थ को सोम, वरुण तथा प्रजापति की जन्मभूमि बताया गया है तथा इस प्रकार से वन पर्व में भी पुल्स्त्य, धौम्य ऋषि की तीर्थ यात्र के प्रसंग में उल्लेख किया गया है कि प्रयागराज में सभी तीर्थों, देवगणों और ऋषिमुनियों का निवास है। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी यह कहा गया है कि माघ महीने में तीन करोड़ दस हजार तीर्थ प्रयाग में एकत्र होते हैं। ब्रह्म पुराण के अनुसार प्रयाग तीर्थ में प्रकृष्ट यज्ञ हुए हैं इसलिए इसे प्रयाग कहा जाता है।

ब्रह्मा जी ने अपनी दिव्य दृष्टि से अन्य तीर्थों के साथ प्रयागराज तीर्थ की तुलना करते हुए उसका महत्व आंका जिसमें उन्होंने यह पाया कि अन्य तीर्थों के मुकाबले प्रयागराज तीर्थ अधिक भारी है। मत्स्य पुराण कहता है कि महाप्रलय की स्थिति में प्रयागराज तीर्थ कभी नष्ट नहीं होता। कर्म पुराण कहता है कि अगर कोई पातकी अन्य तीर्थ स्थान पर पाप करता है उसके पश्चात् प्रयाग में आकर नहा लेता है तो वह पातकी नहीं रह जाता। उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। रामायण में यह उल्लेख मिलता है कि प्रयागराज तीर्थ के चारों तरफ वन था और बीच में गंगा, यमुना की धाराएं और भारद्वाज मुनि का आश्रम था।

शोधार्थियों का यह मानना है कि वर्तमान में जहां भारद्वाज मुनि का आश्रम है वहीं प्राचीन प्रयाग था और धीरे-धीरे इस स्थान में भौगोलिक परिवर्तन हुआ है। आज की भौगोलिक स्थिति प्राचीनकाल के मुकाबले भिन्न है। जिस प्रकार से सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र में स्नान करने का महत्व है और उससे भी अधिक काशी में गंगा स्नान करने का महत्व है। काशी से भी कई गुणा अधिक प्रयागराज तीर्थ में स्नान करना पुण्यदायी माना गया है। कारण यह कि यहां गंगा पश्चिमी वाहिनी होकर बहती है और तीन नदियों का यह मेल स्थल है। यह वह पवित्र स्थान है जहां गंगा, यमुना के छ: तट हैं। इन छ: तटों में से दो तट गंगाजी के, दो तट यमुना जी के तथा दो तट दोनों नदियों के मिश्रित है। यहीं कारण है कि यहां पर स्नान करने वाले प्राणी को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, चारों की प्राप्ति होती है।