भटकते पितरों को गतिशील करते है भगवान इंदिरा एकादशी

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भारत में ऋतुओं से सम्बन्धित त्यौहारों के साथ-साथ कई अन्य विषयों से सम्बन्धित त्यौहार भी मनाए जाते हैं। इस तरह जो जीवन-मरण से सम्बधित दिवस होते हैं इनमें इन्दिरा एकादशी भी एक है। भटकते पितरों को गति देने वाली एकादशी को इन्दिरा एकादशी कहते हैं। इन्दिरा एकादशी आश्विन माह की कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को कहते हैं। इस दिवस को मनाने के पीछे भी एक प्रयोजन है।

पुराणों में कहा गया है कि सतयुग में इन्द्रसेन नामक एक राजा था। एक दिन नारद जी ने राजा से कहा कि मैं यमलोक गया था। वहां देखा कि तुम्हारे पिता जी बहुत दु:खी हैं। नारद जी ने समस्या का समाधान करते हुए सुझाया कि तुम उनकी गति के लिए आश्विन माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत करो। कहा जाता है कि व्रत के प्रभाव से राजा के पिता को गति प्राप्त हो गई तथा वे स्वर्गलोक को चले गए।

राजा की देखा-देखी अनेक प्रजाजन भी यह व्रत रखने लगे। ऐसी मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान अपने पितृगणों का श्राद्ध करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इसलिए इस दौरान ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए जिससे आपको पूर्वजों की नाराज़गी झेलनी पड़े। श्राद्धधवों में रखें ध्यान कि इन दिनों कोई शुभ कार्य न करें एवं नई वस्तु की खरीददारी न करें। इन दिनों घर की छत्त पर रखे बर्तन में हर रोज पानी और खाना रखना चाहिए, ताकि पूर्वजों और पक्षियों की भूख और प्यास बुझ सके।

ध्यान रहे कि इन दिनों काले तिल तृपण करने से पितरों को शांति मिलती है। इस एकादशी पर भगवान विष्णु जी के अवतार भगवान शालिग्राम की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से सात पीढ़ियों तक के पितरों को तो मोक्ष की प्राप्ति होती ही है, साथ ही व्रती के लिए ये व्रत बेहद लाभदायक होता है। इस दिन आप भगवान शालिग्राम की पूजा करें और ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दें।

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