हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 20 सितंबर

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बिहागड़ा महला ५ ॥ खोजत संत फिरहि प्रभ प्राण अधारे राम ॥ ताणु तनु खीन भइआ बिनु मिलत पिआरे राम ॥ प्रभ मिलहु पिआरे मइआ धारे करि दइआ लड़ि लाइ लीजीऐ ॥ देहि नामु अपना जपउ सुआमी हरि दरस पेखे जीजीऐ ॥ समरथ पूरन सदा निहचल ऊच अगम अपारे ॥ बिनवंति नानक धारि किरपा मिलहु प्रान पिआरे ॥१॥

संत जन जीवन के सहारे परमात्मा को (सदा) खोजते रहते हैं, प्यारे प्रभु को मिलने के बिना उनका शरीर कमजोर हो जाता है उनका शारीरिक बल कम हो जाता है। हे प्यारे प्रभु! कृपा कर के मुझे मिल, दया करके मुझे अपने लड़ लगा ले। हे मेरे स्वामी! मुझे अपना नाम देह, मैं (तेरे नाम का सदा) जपता रहूँ, तेरा दर्शन कर के मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा हो जाता है। सब ताकतों के मालिक! हे सर्ब व्यापक! हे सदा अटल रहने वाले! हे सब से ऊँचे! हे अपहुंच! हे बयंत! (गुरू नानक जी कहते हैं) नानक विनती करता है की हे जीवन से प्यारे, कृपा कर के मुझे आ मिल! ॥१॥