Navratri: भक्ति और आस्था का संगम नवरात्र, जानिए मां दुर्गा के नौ रुप

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दुर्गा पूजा भारतीय सनातन संस्कृति का महत्वपूर्ण पर्व है। वैसे तो दुर्गा पूजन वर्ष भर ही होता रहता है परन्तु वर्ष में दो बार पूजन सबसे अधिक लोक प्रसिद्ध है। शारदीय नवरात्र (आश्विन नवरात्र) और वासंती नवरात्र जिन्हें चैत्र माह के नवरात्र भी कहा जाता है, दोनों नवरात्र सम्पातों में पड़ते हैं। सम्पात का भाव है स्थूल रूप से दिन-रात का बराबर होना या पृथ्वी की सूर्य से दूरी सम होना। इसी कारण इन दोनों ही ऋतुओं में ऊर्जा उत्पन्न होती है। दोनों ही समय शुक्ल पक्ष की प्रारंभिक नौ तिथियों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा और व्रत का विधान है जिसे नवरात्र पर्व कहा जाता है।

कन्या पूजन का विधान
शास्त्रों में 2 से 10 वर्ष तक की कन्याओं का पूजन करने का विधान बतलाया गया है। दो वर्ष की कन्या को कुमारी, तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति, चार वर्ष की कन्या को कल्याणी, पांच वर्ष की कन्या को रोहिणी, छ: वर्ष की कन्या को शाम्भवी और आठ वर्ष की कन्या को सुभद्रा कहा गया है। नवरात्र यानी नौ व्रत। इन सभी नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा का विधान है। पहले दिन शैलपुत्री, दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन चन्द्रघंटा, चौथे दिन कूष्मांडा, पांचवें दिन स्कन्दमाता, छठे दिन कात्यायनी, सातवें दिन कालरात्रि, आठवें दिन मां गौरी तथा नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की कुमारी कन्या के रूप में उपासना करनी चाहिए। कुमारी कन्या रूप में पूजन से दु:ख-दरिद्रता का नाश होता है। पुत्र-पौत्र, धर्म एवं अर्थ की इच्छा रखने वाले त्रिमूर्ति कन्या की पूजा करें। कल्याणी कन्या की पूजा करने से विद्या, विजय और सत्ता सुख की प्राप्ति होती है। शत्रुओं के समूल नाश के लिए श्रद्धा भाव से कालिका कन्या के पूजन का विधान है। ऐश्वर्य और धन के इच्छित धर्म-प्रेमियों को चंडिका कन्या का पूजन करना चाहिए। दु:ख दरिद्रता भगाने के लिए शाम्भवी कन्या पूजा की जाती है। परलोक सुख की चाहत पूरी करने के लिए दुर्गा नामक कन्या पूजा का विधान है। मनुष्य मनवांछित फल पाने के लिए सुभद्रा कन्या की पूजा करते हैं जबकि रोग नाश के लिए रोहिणी कन्या की पूजा की जाती है। नवरात्रों में पांच या इससे अधिक कन्याओं के पूजन के साथ-साथ एक लड़के अर्थात् लैंकड़े को भी भोजन करवा कर दक्षिणा देने की परम्परा है। लैंकड़े को शृंगार का सामान नहीं दिया जाता। नवरात्र पूजा के आठवें व नौवें दिन नौ कुंवारी कन्याओं का पूजन कराने व यथाशक्ति और सामर्थ्य अनुसार उपहार देने का विधान है। कुवारी कन्याओं के पैर धोकर उन्हें आसन ग्रहण करवाएं। बाएं हाथ पर मौली बांध कर माथे पर रौली का तिलक लगाएं। फिर हलवा, पूरी व चने का प्रसाद और फलादि कंजकों को खिलाने के उपरांत लाल चुनरी, चूड़ियां और दक्षिणारूपी धन देकर उनके पांव छूकर आशीर्वाद के रूप में थपकी लें व सम्मानपूर्वक विदा करें। धार्मिक मान्यतानुसार नामक असुरों ने अपनी आसुरी प्रवृत्ति से सम्पूर्ण जगत में धर्म का नाश करने की ठान ली। धर्म का पालन करना टेढ़ी खीर साबित होने लगा। असहाय हो सभी देवी-देवता मां पार्वती जी की शरण में गए और अपनी व्यथा कह सुनाई। सब देवताओं की बात सुन देवी पार्वती के शरीर से एक कुंवारी कन्या दिव्य रूप में प्रकट हुई जिसने को मौत के घाट उतार कर पृथ्वी पर फिर से धर्म की स्थापना की। जब-जब आसुरी ताकतों ने धर्म को उखाड़ने की चेष्टा की तब-तब देवताओं ने मां दुर्गा का श्रद्धापूर्वक ध्यान कर पूजन किया व त•ाी से नवरात्र व्रत प्रथा का प्रारंभ हुआ।

मां दुर्गा के नौ रूप
नवरात्र पर्व में मां भगवती की पूजा नौ दिन की जाती है। इन नौ दिनों में मां के नौ ही रूपों की पूजा का विधान है जिससे सम्पूर्ण मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

मां शैलपुत्री
हिमालय के यहां पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण उनका नाम शैलपुत्री हुआ। दाएं हाथ में त्रिश्ूाल और वाहन वृषभ। इन्हें सती के नाम से भी जाना जाता है। जब प्रजापति ने भगवान शंकर का अनादर किया तो सती ने भगवान के साथ अनुचित व्यवहार को सहन न कर अग्नि में जलाकर स्वयं को भस्म कर लिया। अगले जन्म में सती शैलराज हिमालय की पुत्री कहलाईं। हेमवती व पार्वती भी इसी देवी के अन्य नाम हैं। शैलपुत्री ही भगवान शिव की अर्द्धांगिनी बनीं।

मां ब्रह्मचारिणी
दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी मां की इस रूप में पूजा की जाती है। पूर्व जन्म में राजा हिमालय के घर जन्मी इस देवी को देवर्षि नारद जी ने भगवान शंकर को पति रूप में पाने के लिए घोर तपस्या का आदेश दिया। एक सौ वर्ष तक केवल भूमिशयन और शाक पर निर्वाह किया एवं एक हजार वर्ष की अवधि तक केवल फल-फूल पर निर्भर रह तपस्या की। कई हजार वर्ष निर्जल और निराहार रहने के कारण तथा पत्तों आदि को खाना छोड़ देने से इन्हें ‘अर्पणा’ के नाम से पूजा जाता है। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है।

मां चन्द्रघण्टा
इस देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ-साथ विनम्रता भी आती है। परम कल्याणकारी मां चन्द्रघण्टा जहां इहलोक में भौतिक सुखदायक हैं वहीं इनकी आराधना से परलोक में सद्गति प्राप्त होती है। दस हाथों वाली यह देवी स्वर्ण की तरह चमक लिए हुए हैं। सिंह पर सवार यह देवी हाथ में खड्ग और अन्य अस्त्र-शस्त्र से विभूषित हैं। देवी मां के मस्तिक पर घंटे के आकार का आधा चन्द्र है इसीलिए देवी मां को चन्द्रघण्टा का नाम मिला। देवी मां की गर्जना से अत्याचारी, राक्षसी प्रवृत्ति वाले कांप जाते हैं। नवरात्र के तीसरे दिन इन्हीं देवी मां की पूजा का विधान है।

मां कूष्माण्डा
जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था तब इसी देवी ने ब्रह्माण्ड की रचना की थी इसलिए इस देवी को आदिस्वरूपा आदि शक्ति कहा गया है। अष्टभुजा वाली इस देवी के सात हाथों में कमंडल, कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जप माला है। मां दुर्गा के कूष्माण्डा रूप के कारण ही दसों दिशाएं इनके तेज से आलोकित हैं। चौथे दिन इस देवी की पूजा करनी चाहिए इससे रोग-शोक से मुक्ति मिलती है।

मां स्कन्दमाता
कमल के आसन पर विराजित रहने के कारण इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है। इनकी कृपा से मूढ़ भी ज्ञानी हो जाता है। स्कन्द कुमार कार्तिकेय की माता होने के कारण इनका नाम स्कन्दमाता है। चार भुजाओं वाली यह देवी विद्वानों और सेवकों को पैदा करने वाली है। सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक आलौकिक तेज और कांतिमयी हो जाता है।

मां कात्यायनी
महर्षि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की पुत्री प्राप्ति इच्छा से घोर तपस्या की। मां भगवती ने पुत्री रूप में उनके घर जन्म लिया इसीलिए यह देवी कात्यायनी भी कहलाई जाती हैं। देवी कात्यायनी ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं। भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने दुर्गा मां के इसी रूप की पूजा भी की थी। इनके उपासक अतिशीघ्र, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों फलों को प्राप्त करते हैं और सुख-शांति पाते हैं।

मां कालरात्रि                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                सिर के बिखरे बाल, काला रंग, गले में चमचमाती माला, तीन नेत्रों वाली मां दुर्गा के इस रूप में जब यह सांस लेती हैं तो सांसों से अग्नि की ज्वाला निकलती है। गदर्भ पर सवार मां दुर्गा का यह रूप चाहे भयानक है परन्तु ये सदैव शुभ फलदायक है। अगर हम आसुरी शक्तियों की बात करें तो आसुरी शक्तियां इनके नाम के उच्चारण से भाग जाती हैं। इनकी उपासना से ग्रह बाधाओं का भी शमन होता है।

मां महागौरी
नवरात्र में आठवें दिन महागौरी शक्ति की पूजा की जाती है। चार भुजाओं वाली दुर्गा मां के इस रूप की सवारी वृषभ है। आभूषण एवं वस्त्र सफेद होने के कारण इन्हें श्वेताम्बरधरा भी कहा जाता है। पति रूप में शिव को प्राप्त करने के लिए महागौरी ने कठोर तपस्या की थी। तप के कारण शरीर काला पड़ गया परन्तु भगवान शिव ने गंगा जी के पावन जल से शरीर को धोकर कांतिमय बना दिया। इस कारण ये महागौरी कहलाईं। इनकी कृपा से आलौकिक सिद्धियां प्राप्त होती हैं।

मां सिद्धिदात्री
सर्व सिद्धियां प्रदान करने वाली इस देवी से ही भगवान शिव ने सिद्धियां प्राप्त कीं। इन्हीं की कृपा से शिव को अर्द्ध-नारीश्वर होने का गौरव प्राप्त हुआ। इस देवीरूपा दुर्गा मां की पूजा का विधान नौवें दिन है। इनकी उपासना मनवांछित फलदायक है। विधिपूर्वक मां दुर्गा के इस रूप की पूजा करने से सिद्धियां प्राप्त होती हैं।