प्रशांत महासागर के द्वीप देशों को मौखिक वादे के बजाय अमेरिका की सदिच्छा की जरूरत है

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28 से 29 सितंबर तक अमेरिका–प्रशांत महासागर के द्वीप देशों का पहला शिखर सम्मेलन वाशिंगटन में आयोजित हुआ ।अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने दावा किया कि इस बैठक का उद्देश्य अमेरिका और प्रशांत महासागर के द्वीप देशों के बीच संबंध गहराना है ।उन्होंने द्वीप देशों को 81 करोड़ डॉलर की अतिरिक्त सहायता देने की घोषणा की ।पर स्थानीय विश्लेषकों के विचार में प्रशांत महासागर के द्वीप देशों को मौखिक वादे के बजाय अमेरिका की सदिच्छा की अधिक जरूरत है ।जैसे अमेरिकी शांति अध्ययन संस्थान ने कहा कि प्रशांत महासागर के द्वीप देशों के नेताओं की आशा है कि वाशिंगटन का वादा भू-राजनीतिक स्पर्द्धा के ख्याल से नहीं आया ।अगर अमेरिका सचमुच प्रशांत महासागर के द्वीप देशों को मदद देना चाहता है ,तो कम से कम चार पहलुओं में काम करना चाहिए।पहला ,मौखिक वादे को लागू करना चाहिए ।अमेरिका अकसर वैदेशिक सहायता प्रदान करने की खाली बात करता है और क्रियान्वयन नहीं करता है।

दूसरा ,जलवायु परिवर्तन के निपटारे में अमेरिका खुद मिसाल कायम करे ।इधर के कुछ सालों में ग्लोबल वार्मिंग के कारण प्रशांत महासागर के द्वीप देश गंभीर प्राकृतिक चुनौती का सामना कर रहे हैं ।कुछ देशों के समुद्र में डूबने का खतरा है ।लेकिन विश्व में ग्रीन हाउस गैसों के सबसे बड़े उत्सर्जक देश के नाते अमेरिका ने अब तक वर्ष 2009 कोपेहेगन जलवायु महासभा में किए गए इस वादे पर अमल नहीं किया यानी वह वर्ष 2020 से पहले जलवायु परिवर्तन के मुकाबले के लिए हर साल विकासशील देशों को कम से कम 1 खरब डॉलर की सहायता प्रदान करेगा ।  तीसरा ,अमेरिका को समुद्री पर्यावरण की सुरक्षा में ठोस कदम उठाने चाहिए।जापान जबरदस्त विरोध की अनदेखी कर प्रशांत महासागर में प्रमाणु दूषित जल छोड़ रहा है ,पर अमेरिका इसकी मौन अनुमति देता है ।

चौथा ,अमेरिका को द्वीप देशों को समानता के आधार पर साझेदार देखना चाहिए ,न कि भू-राजनीति के मोहरे के तौर पर ।द्वीप देशों की सहायता करने में अमेरिका को उनकी प्रभुसत्ता व इच्छा का सम्मान कर कोई राजनीतिक शर्त नहीं रखनी चाहिए और तीसरे पक्ष के खिलाफ नहीं होना चाहिए ।

(वेइतुंग)