Ludhiana : डफ सिस्टम से बहादुरके डाइंग इंडस्ट्री के पानी को ट्रीट करने में आएगा और निखार

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लुधियाना : बहादुरके टैक्सटाइल एंड निटवियर एसोसिएशन (15 एम.एल.डी. सी.ई.टी.पी.) ने डाइंग इंडस्ट्री के डिस्चार्ज को ट्रीट करने के लिए 15 एमएलडी क्षमता का ट्रीटमैंट प्लांट करीब डेढ़ साल पहले स्थापित किया है। कॉमन इफ्यूलैंट ट्रीटमैंट प्लांट (सीईटीपी) स्थापित होने से डाइंग यूनिट्स के पानी को ट्रीट करने की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। गुणवत्ता में और सुधार लाने के लिए डाइंग इंडस्ट्री ने सीईटीपी में डिजोल्व एयर फ्लोटिंग (डफ) सिस्टम तैयार करवाया है। सीईटीपी को अपग्रेड करने के लिए करीब साढ़े 4 करोड़ रुपए लागत आई है। एसोसिएशन के पदाधिकारी सुभाष सैनी बताते हैं बुड्ढा दरिया को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए बहादुर-के रोड पर सीईटीपी बनवाया गया है। बहादुर-के रोड के करीब 36 डाइंग यूनिट्स इस प्लांट की मैंबर हैं।

प्लांट में रोजाना करीब 13 एमएलडी पानी ट्रीट करने के लिए पाइप लाइन के जरिए पहुंचता है। सीईटीपी में डाइंग यूनिट्स के पानी को ट्रीट करने के परिणामों में काफी सुधार हुआ है, लेकिन महसूस किया गया कि पानी को ट्रीट की गुणवत्ता में और सुधार की जरूरत है। वह इसलिए क्योंकि जब पानी को सीईटीपी में ट्रीट किया जाता तो परिणाम ठीक आते, लेकिन जब यह पानी आगे आउट लेट पर छोड़ा जाता तो बीओडी-सीओडी का संतुलन बिगड़ जाता है। वे बताते हैं कि करीब सवा साल से रिसर्च की जा रही थी कि वाटर ट्रीटमैंट के बावजूद यह संतुलन क्यों बिगड़ रहा है।

पंजाब पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के अधिकारियों के ध्यान में लाने के बाद निजी कंपनियों के माहिरों की मदद ली गई। रिसर्च में सामने आया कि ट्रीट होने वाले पानी में टोटल सस्पैंडिंट सॉलिड (टीएसएस) की वजह से ट्रीटेड वाटर में सीओडी-बीओडी का लेवल ऊपर-नीचे हो रहा था, इसलिए डिजोल्व एयर फ्लोटिंग (डफ) सिस्टम स्थापित करवाने की अति जरूरत महसूस की गई। सुभाष सैनी बताते हैं कि डफ सिस्टम तैयार होने के बाद ट्रायल लिया गया तो पिछले समय की तुलना में अब परिणाम और भी ज्यादा निखरकर सामने आए हैं। आगामी 10-15 दिनों में और सुधार देखने को मिलेंगे। वह बताते हैं यह प्लांट एसबीआर टैक्नोलॉजी पर आधारित है, जबकि डाइंग इंडस्ट्री में सीजन के हिसाब से कपड़े-धागे की रंगाई करने के रुझान बदलते रहते हैं। लिहाजा अलग-अलग रुझानों के साथ एक ही डिजाइन पर संचालित हो रहे सीईटीपी के काम करने की क्षमता पर असर पड़ता रहा।

ऐसे काम करता है डफ सिस्टम

अलग-अलग डाइंग यूनिट्स से आने वाले पानी को पहले एक बड़े टैंकर में इकट्ठा किया जाता है। अलग-अलग प्रक्रियाओं से गुजरता हुआ यह डिजोल्व एयर फ्लोटिंग (डफ) सिस्टम में पहुंचता है। डफ सिस्टम एक बड़े टब की तरफ होता है, जिसमें आने वाले पानी में जमा स्लज (गाद) बहकर ऊपरी सतह पर आ जाती है। पानी पाइप लाइन के रास्ते अगले पड़ाव पर चला जाता है, जबकि स्लज को अलग लिया जाता है।

स्लज उठवाने के खर्च में कटौती के प्रयास

सुभाष सैनी बताते हैं प्लांट पर रोजाना पैदा हो रही स्लज को उठवाने पर काफी खर्च आ रहा है। एक अनुमान के मुताबिक वाटर ट्रीटमैंट कर यहां रोजाना करीब 5 से 6 टन स्लज निकलती है, जिसमें लगभग 40 से 50 फीसदी पानी होता है। प्लांट में ड्रायर सिस्टम भी लगवाया जा रहा है, ताकि पानी को सुखाकर स्लज के वजन में कटौती करवाई जा सके। ड्रायर लगने पर गाद उठवाने के खर्च में 40 से 50 फीसदी तक कटौती संभव है।