हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 23 अक्टूबर

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रामकली महला १ घरु १ चउपदे ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥ कोई पड़ता सहसाकिरता कोई पड़ै पुराना ॥ कोई नामु जपै जपमाली लागै तिसै धिआना ॥ अब ही कब ही किछू न जाना तेरा एको नामु पछाना ॥१॥ न जाणा हरे मेरी कवन गते ॥ हम मूरख अगिआन सरनि प्रभ तेरी करि किरपा राखहु मेरी लाज पते ॥१॥ रहाउ ॥ कबहू जीअड़ा ऊभि चड़तु है कबहू जाइ पइआले ॥ लोभी जीअड़ा थिरु न रहतु है चारे कुंडा भाले ॥२॥ मरणु लिखाइ मंडल महि आए जीवणु साजहि माई ॥ एकि चले हम देखह सुआमी भाहि बलंती आई ॥३॥ न किसी का मीतु न किसी का भाई ना किसै बापु न माई ॥ प्रणवति नानक जे तू देवहि अंते होइ सखाई ॥४॥१॥

अर्थ: हे हरी! मुझे ये समझ नहीं थी कि (तेरे नाम के बिना) मेरी आत्मिक अवस्था नीचे चली जाएगी। हे प्रभू! मैं मूर्ख हूँ, अज्ञानी हूँ, (पर) तेरी शरण आया हूँ। हे प्रभू पति! मेहर कर (मुझे अपना नाम बख्श, और) मेरी इज्जत रख ले।1। रहाउ। हे प्रभू! (तेरा नाम बिसार के) कोई मनुष्य मगधी प्राक्रित में लिखे हुए (संस्कृत के) बौध व जैन ग्रंथ पढ़ रहा है, कोई (तुझे भुला के) पुराण आदि पढ़ता है, कोई (किसी देवी-देवते को सिद्ध करने के लिए) माला से (देवते के) नाम का जाप करता है, कोई समाधि लगाए बैठा है। पर हे प्रभू! मैं सिर्फ तेरे नाम को पहचानता हूँ (तेरे नाम से ही सांझ डालता हूँ), मैं कभी भी (तेरे नाम के बिना) कोई और उद्यम (ऐसा) नहीं समझता (जो आत्मिक जीवन को ऊँचा कर सके)।1। (तेरे नाम को बिसार के जीव लोभ में फंस जाता है) कभी (जब माया मिलती है धन मिलता है) जीव (बड़ा ही खुश होता है, मानो) आकाश में जा चढ़ता है, कभी (जब धन की कमी हो जाती है, तब बहुत डावाँडोल हो जाता है, जैसे) पाताल में जा गिरता है। लोभ-वश हुआ जीव अडोल-चिक्त नहीं रह सकता, चारों तरफ (माया की) तलाश करता फिरता है।2। हे माँ! जीव जगत में (ये लेख माथे पर) लिखा के लाते हैं (कि) मौत (अवश्य आएगी, पर तुझे बिसार के यहाँ सदा) जीते रहने की विउंते बनाते हैं। हे मालिक प्रभू! हमारी आँखों के सामने ही अनेकों जीव (यहाँ से) चलते जा रहे हैं, (मौत की) आग जल रही है (इसमें सबके शरीर भस्म हो जाने हैं, पर नाम से टूट के जीव हमेशा जीवन ही लोचते फिरते हैं)।3। हे प्रभू! ना किसी का कोई मित्र, ना किसी का कोई भाई, ना किसी का कोई पिता ना किसी की माँ (आखिर में कोई किसी का साथ नहीं निभा सकता)। गुरू नानक जी कहते हैं, नानक (तेरे दर पर) विनती करता है- यदि तू (अपने नाम की दाति) दे, तो (सिर्फ यही) आखिर में सहायक हो सकता है।4।1।