हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 26 अक्टूबर

ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥ रागु गोंड चउपदे महला ४ घरु १ ॥ जे मनि चिति आस रखहि हरि ऊपरि ता मन चिंदे अनेक अनेक फल पाई ॥ हरि जाणै सभु किछु जो जीइ वरतै प्रभु घालिआ किसै का इकु तिलु न गवाई ॥ हरि तिस की आस कीजै मन मेरे जो सभ महि सुआमी रहिआ समाई ॥१॥मेरे मन आसा करि जगदीस गुसाई ॥ जो बिनु हरि आस अवर काहू की कीजै सा निहफल आस सभ बिरथी जाई ॥१॥ रहाउ ॥जो दीसै माइआ मोह कुट्मबु सभु मत तिस की आस लगि जनमु गवाई ॥ इन्ह कै किछु हाथि नही कहा करहि इहि बपुड़े इन्ह का वाहिआ कछु न वसाई ॥ मेरे मन आस करि हरि प्रीतम अपुने की जो तुझु तारै तेरा कुट्मबु सभु छडाई ॥२॥जे किछु आस अवर करहि परमित्री मत तूं जाणहि तेरै कितै कमि आई ॥ इह आस परमित्री भाउ दूजा है खिन महि झूठु बिनसि सभ जाई ॥ मेरे मन आसा करि हरि प्रीतम साचे की जो तेरा घालिआ सभु थाइ पाई ॥३॥आसा मनसा सभ तेरी मेरे सुआमी जैसी तू आस करावहि तैसी को आस कराई ॥किछु किसी कै हथि नाही मेरे सुआमी ऐसी मेरै सतिगुरि बूझ बुझाई ॥ जन नानक की आस तू जाणहि हरि दरसनु देखि हरि दरसनि त्रिपताई ॥४॥१॥

अर्थ : परमात्मा एक है, उसका नाम सत्य है, वही संसार को बनाने वाला है, सर्वशक्तिमान है, उसको किसी का भय नहीं है, वह वैर भावना से रहित है, वह कालातीत ब्रह्म-मूर्ति सदा शाश्वत है, वह जन्म-मरण से रहित है, वह स्वयं ही प्रकाशमान हुआ है, जिसे गुरु-कृपा से पाया जा सकता है। रागु गोंड चउपदे महला ४ घरु १ ॥ हे जीव ! यदि मन में भगवान् पर आशा रखोगे तो अनेकों ही मनोवांछित फलों की प्राप्ति हो जाएगी।जो तेरे दिल में है, परमात्मा सबकुछ जानता है। प्रभु इतना दयालु है कि वह किसी की मेहनत को तिल भर भी व्यर्थ नहीं होने देता।हे मेरे मन ! उस ईश्वर पर आशा रखो, जो सबमें समा रहा है॥ १॥ हे मेरे मन ! ईश्वर की ही आशा करो,जो व्यक्ति प्रभु के अलावा किसी अन्य पर आशा करता है, उसकी वह आशा निषफल है और वह सारी व्यर्थ हो जाती है॥ १॥ रहाउ I। यह जो सारा परिवार नजर आता है, यह माया का मोह है, इस परिवार की आशा में लगकर अपना जन्म मत गंवाना।परिवार के इन सदस्यों के वश में कुछ भी नहीं है, ये बेचारे कुछ नहीं कर सकते। इनके करने से कुछ नहीं होता और इनका कुछ वश नहीं चलता। हे मेरे मन ! अपने प्यारे प्रभु की आशा करो, जो तुझे भवसागर से पार कर देगा और तेरे पूरे परिवार को भी यम से छुड़ा देगा॥ २॥ यदि तू अपने किसी पराए मित्र की आशा करता है तो यह मत समझ लेना कि यह तेरे कहीं काम आएगी। पराए मित्र की आशा तो द्वैतभाव है, जो झूठी होने के कारण क्षण में नाश हो जाती है।हे मेरे मन ! अपने सच्चे प्रियतम प्रभु की आशा करो, जो तेरी सारी मेहनत को साकार कर देता है॥ ३॥ हे मेरे स्वामी ! यह आशा एवं अभिलाषा सब तेरी ही हैं, तू जैसी आशा करवाता है, वैसी ही कोई आशा करता है।मेरे सतगुरु ने मुझे यही सूझ दी है कि किसी भी जीव के हाथ में कुछ भी नहीं है। हे हरि ! गुरू नानक जी कहते हैं, हे परमात्मा,नानक की आशा तू ही जानता है और तेरे दर्शन करके मैं तृप्त हो जाता हूँ॥ ४॥ १॥