पुराणों के अनुसार तिथि के हिसाब से करें भोजन, जानिए कब कौन सा भोजन करना चाहिए

भोजन मुनष्य के जीवन के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। लेकिन क्या आप जानते है की पुराणों में भोजन करने के नियमों के बारे में बताया गया है। माना जाता है के अगर सही तरह से और सही समय पर भोजन ना किया जाए तो वह हमारे शरीर और हमारे जीवन पर बुरा प्रभाव डालते है। इसीलिए पुराणों में भी भोजन के कुछ नियम तय किए गए हैं। जिनमें एक नियम तिथियों के अनुसार उपवास रखते हुए भोजन करने का है। आइए जानते है उन नियमों के बारे में:

तिथियों के अनुसार भोजन के नियम
राण में सुमन्तु मुनि ने तिथियों के अनुसार व्रत व उनमें भोजन की विधि के बारे में बताया है. उनके अनुसार प्रतिपदा यानी एकम तिथि को मनुष्य को दूध का सेवन करना चाहिए. द्वितीया तिथि को बिना नमक का भोजन करना चाहिए. तृतीया के दिन तिल अन्न व चतुर्थी को फिर दूध का सेवन करना चाहिए. पंचमी को फल, षष्ठी को शाक, सप्तमी को बिल्व आहार लेना चाहिए. अष्टमी को पिष्ट, नवमी को अनग्रिपाक, दशमी व एकादशी को घी का सेवन करना चाहिए. द्वादशी को खीर, त्रयोदशी को गो मूत्र, चतुर्दशी को यवान्न का भक्षण करना चाहिए. पूर्णिमा को कुशा का जल व अमावास्या को हविष्य- भोजन करना चाहिए. इस तरह के व्रत की शुरुआत अश्विनी मास की नवमी, माघ मास की सप्तमी, वैशाख की तृतीया तथा कार्तिक मास पूर्णिमा से करना चाहिए. ऐसा करने से पारलौकिक सुख के साथ इस लोक में भी लंबी आयु मिलने की मान्यता है.

अश्वमेध यज्ञ का मिलता है फल
भविष्य पुराण के अनुसार इस विधि से पूरे एक पक्ष भोजन करने पर मनुष्य दस अश्वमेध यज्ञों का फल पाता है. उसे मृत्यु के बाद मनवन्तर तक स्वर्ग में निवास मिलता है. यदि तीन- चार महीने तक इस विधि से भोजन करे तो उसे सौ अश्वमेध यज्ञों का फल व अनेक मन्वन्तरों तक स्वर्ग में सुख का भोग मिलता है. पूरे आठ महीने तक इस विधि से भोजन करने पर एक हजार अश्वमेध यज्ञों का फल व 14 मनवन्तर तक स्वर्ग का और एक साल तक नियमपूर्वक भोजन करने पर कई मनवन्तरों तक सूर्य लोक का सुख भोग मिलता है.