1946 के RIN विद्रोह पर IANS की डॉक्यूमेंट्री हुई रिलीज

नई दिल्ली: देश की प्रमुख स्वतंत्र न्यूजवायर इंडो-एशियन न्यूज सर्विस (आईएएनएस) ने अपना पहला वृत्तचित्र पूरा कर लिया है। इसका शीर्षक ‘द लास्ट पुश ऑन द रॉयल इंडियन नेवी म्यूटिनी ऑफ 1946’ है। टीवी पत्रकार व वृत्तचित्र निर्माता सुजय ने कहा, देश जब अपनी स्वतंत्रता के अमृत काल की ओर बढ़ रहा है, यह स्वतंत्रता संग्राम के भूले हुए प्रसंगों पर लघु फिल्मों की श्रृंखला की पहली कड़ी होगी।

इंपीरियल वॉर म्यूजियम व कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से भूले हुए फुटेज और भारत, पाकिस्तान के अखबारों से सामग्री एकत्रित कर वीरता की कहानी द लास्ट पुश विद्रोह के 72 घंटों की पुनर्रचना की गई है। यह विद्रोह नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज की बहादुरी से प्रेरित था, जिसने ब्रिटिश राज के अंत को तेज कर दिया।

फिल्म का प्रीमियर 25 जनवरी यानि आज फिल्म डिवीजन ऑडिटोरियम, नई दिल्ली में केंद्रीय भारी उद्योग और सार्वजनिक उद्यम मंत्री डॉ. महेंद्र नाथ पांडे और विदेश राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी की उपस्थिति में हुआ। स्क्रीनिंग के बाद फिल्म के निर्देशक सुजय, 1946: रॉयल इंडियन नेवी म्यूटिनी-लास्ट वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस के लेखक व रोली बुक्स के संस्थापक-प्रकाशक प्रमोद कपूर और डॉ. बी.आर. अम्बेडकर विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज के इतिहास के प्रोफेसर सलिल मिश्रा ने विद्रोह पर चर्चा की।

उल्लेखनीय है कि 18 फरवरी, 1946 को, रॉयल इंडियन नेवी के सिपाही बॉम्बे में हड़ताल पर चले गए, जहाजों से ब्रिटिश झंडे उतार दिए और तीन दिनों में 78 जहाजों और 21 तटीय प्रतिष्ठानों पर नियंत्रण कर लिया। विद्रोह का प्रभाव ब्रिटिश भारतीय अन्य सैन्य इकाइयों पर पड़ा। 48 घंटों तक ब्रिटिश साम्राज्य के मुकुट में जड़ा रत्न नियंत्रण से बाहर होता देखा गया। अब अंग्रेजों को एहसास हो गया था कि उनके पास भारत छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। लेकिन आजादी के 75 साल बाद भी 1946 का रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में मुश्किल से जगह बना पाता है।

द लास्ट पुश एक राष्ट्र की सामूहिक स्मृति में अंतर को ठीक करने का एक छोटा सा प्रयास है। यह उन तथ्यों और घटनाओं को सामने रखने का एक प्रयास है, जिसे भारत का अंतिम स्वतंत्रता संग्राम माना जा सकता है। इस साहसिक कार्य के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए आईएएनएस के प्रबंध निदेशक, सीईओ और प्रधान संपादक संदीप बामजई ने कहा, “लंदन में युद्ध के बाद की सरकार को एहसास हुआ कि आरआईएन विद्रोह ने भारत से ब्रिटेन के बाहर निकलने की प्रक्रिया को तेज कर दिया है। स्वतंत्रता की भावना से ओतप्रोत स्वत:स्फूर्त इस विद्रोह का देश भर की सेनाओ पर प्रभाव पड़ा।”