सैन्य परेड से लेकर ‘बीटिंग द रिट्रीट’ तक ऐसे मनाया जाता है गणतंत्र दिवस, जानिए कुछ दिलचस्प तथ्य

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नई दिल्लीः भारत में हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पूरे जोश व उत्साह से मनाया जाता है। जनपथ, नई दिल्ली पर भारतीय राष्ट्रीय सेना की शानदार परेड निकलती है, जिसमें विभिन्न राज्यों की संस्कृति को प्रदर्शित करती हुई झांकियां भी होती हैं। इसके अतिरिक्त देश के विभिन्न हिस्सों में राष्ट्रीय ध्वज भी फहराया जाता है। इस साल हम भारत का 74वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं। ब्रिटिश राज से स्वतंत्रता पाने के बाद डा. बी.आर. अम्बेडकर के नेतृत्व में ड्राफ्टिंग कमेटी ने नए संविधान की रचना की। भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, जिसके तहत भारत को स्वतंत्र संप्रभु गणराज्य घोषित किया गया। 26 जनवरी का चयन इसलिए किया गया क्योंकि इस दिन 1930 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अंग्रेजों की गुलामी से निकलने के लिए पूर्ण स्वराज पाने की घोषणा की थी गणतंत्र दिवस पूरे देश में संतोष व खुशी के साथ मनाया जाता है। यह स्वतंत्र भारत के संविधान को अंगीकार करने का दिन है।

स्कूलों व कॉलेजों में ध्वजारोहण किया जाता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिनमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित बातों पर अधिक फोकस होता है। नई दिल्ली में इंडिया गेट पर भारत के राष्ट्रपति ध्वजारोहण करते हैं। भव्य परेड राजपथ, नई दिल्ली में आयोजित की जाती है, जिसका संचालन भारत के राष्ट्रपति और व्यवस्था रक्षा मंत्रालय करता है। परेड में सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करने के अतिरिक्त भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति को भी प्रोत्साहित किया जाता है। जिन शहीदों ने देश के लिए अपनी जान की कुरबानी दी उनका सम्मान करने के लिए भारत के प्रधानमंत्री इंडिया गेट की अमर जवान ज्योति पर रिंगलेट रखते हैं, जिसके बाद 21-तोपों की सलामी दी जाती है, ध्वजारोहण होता है और राष्ट्रगान होता है। बहादुर सैनिकों को परमवीर चक्र, अशोक चक्र व वीर चक्र के रूप में अवार्डस दिए जाते हैं। जिन बच्चों व आम नागरिकों ने विपरीत स्थितियों में साहस का परिचय दिया होता है उन्हें भी अवार्डस से सम्मानित किया जाता है।

गैलेंट्री अवॉर्डस के विजेता सैन्य जीपों में राष्ट्रपति को सैल्यूट करते हैं। इसके बाद भारत की सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया जाता है। विभिन्न रेजिमैंट्स से जब भारत के राष्ट्रपति सैल्यूट ले लेते हैं तो फिर सशस्त्र बलों, पुलिस व नैशनल कैडेट कोर की मार्च-पास्ट होती है। भारतीय वायु सेना के फाइटर जेट्स जब जनपथ पर उड़ान भर लेते हैं, तब परेड का समापन होता है। हालांकि जश्न पूरे देश में मनाया जाता है, लेकिन दिल्ली चूंकि देश की राजधानी है, इसलिए गणतंत्र दिवस का सबसे बड़ा आयोजन दिल्ली में ही होता है। परेड का लाइव वैबकास्ट किया जाता है जिसे लाखाें लोग इंटरनैट पर देखते हैं। आयोजन समाप्त होने के बाद एक्सक्लूसिव फुटेज ‘वीडियो ऑन डिमांड’ के तौरपर उपलब्ध रहता है। राज्यों की राजधानियों में जो जश्न मनाए जाते हैं, उनमें ध्वजारोहण राज्यपाल करते हैं। जिला मुख्यालयों, कस्बों, पंचायतों आदि में भी जश्न मनाए जाते हैं।

मां, मातृभाषा और मातृभूमि तीनों ही हमारी सभ्यता, संस्कृति और संस्कार के स्नेत है। मां ने शरीर दिया तो मातृभूमि ने पहचान, मातृभाषा ने ही जोड़ा इस संसार और ज्ञान परम्परा से। इन तीनों से ही निर्मित होता है हमारा व्यक्तित्व। हमारी मां, मातृभाषा और, मातृभूमि दूसरों की नजरों में चाहे जैसी भी हो परंतु वे हमारे लिए प्राण तत्व है। हमारा डी.एन.ए. है। हमारी पहचान हमारी राष्ट्रीयता के रूप में हमारे मस्तक पर अंकित है इसीलिए विश्व भ्रमण करते हुए अनेक स्थानों पर चेहरा देख ‘नमस्ते इंडिया’ से मेरा अभिवादन हुआ। इधर शिक्षा, सामाजिक-राजनैतिक परिवेश तथा सोशल मीडिया पूरी धरा को अपना कुटम्ब मानने वालों को ‘ग्लोबल विलेज’ की नकली अवधारणा की घुट्टी पिला रहे हैं। बदलती जीवन शैली में संस्कारों की पकड़ कमजोर कर रही है। भगवान से बढ़कर समझी जाने वाली मां, मातृभाषा, मातृभूमि की महत्ता भी प्रभावित किया जा रहा है।

संस्कृति की वाहिनी अपनी श्रेष्ठ भाषाओं के बदले गुलामी की भाषा को अधिमान दिया जा रहा है। अधिक से अधिक भाषाएं सीखना, जानना अच्छी बात हैं लेकिन मातृभाषा की कीमत पर हर्गिज नहीं। अपनेपन से दूर परिस्थितिवश किसी भी बोली-भाषा का उपयोग करना पड़े परंतु अपनों के बीच, अपने परिवार में अपनी मातृभाषा का उपयोग कर हम भावी पीढ़ी को महान पूर्वजों की हजारों वर्षो की परम्परा से जोड़ते हैं। बच्चों को मातृभाषा से इसलिए भी जोड़ना जरूरी है क्योंकि विश्व के श्रेष्ठ मनोवैज्ञानिकों, शिक्षाविदें की सर्वसम्मत राय है कि बच्चों की प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा मातृभाषा, परिवेश की भाषा में होनी चाहिए। अनेक शोधों ने सिद्ध किया है कि जीवन के आरंभिक वर्षो और प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा माध्यम में पढ़ने वाले बच्चों में सर्वश्रेष्ठ संवेगात्मक विकास के साथ साथ सभी विषयों की समझ और अधिगम भी बेहतर होते हैं। उल्लेखनीय है कि यहां ‘मातृभाषा, परिवेश की भाषा’ शब्द का उपयोग किया गया है। बहरहाल, अब हम आपको गणतंत्र दिवस से संबंधित ऐसे पांच दिलचस्प तथ्य बताते हैं, जिनके बारे में कम लोग जानते हैं।

– 1950 और 1954 के बीच गणतंत्र दिवस की परेड दिल्ली में इरविन स्टेडियम (अब नैशनल स्टेडियम), किंग्सवे, लाल किले व रामलीला मैदान में आयोजित की जाती थी।

– 1955 से गणतंत्र दिवस के आयोजन राजपथ पर किए जा रहे हैं। राजपथ का नाम पहले किंग्सवे था, जोकि भारत के तत्कालीन सम्राट जॉर्ज पंचम के सम्मान में रखा गया था। आजादी के बाद इस सड़क का नाम बदलकर राजपथ कर दिया गया। दिलचस्प यह है कि हिंदी में ‘किंग्स वे’ का अर्थ ‘राज पथ’ ही है।

– हर साल किसी खास देश के प्रमुख को गणतंत्र दिवस परेड में मुख्य अतिथि के तौरपर आमंत्रित किया जाता है। 1950 में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो भारत की गणतंत्र दिवस परेड के पहले मुख्य अतिथि थे।

– भारत के राष्ट्रपति के आगमन पर ही परेड आरंभ होती है। राष्ट्रपति की सवारी के बॉडीगार्डस ही सबसे पहले राष्ट्रध्वज को सलामी देते हैं। राष्ट्रगान होता है और फिर 21-तोपों की सलामी दी जाती है। वास्तव में 21 तोप नहीं चलाई जाती हैं। यह काम भारतीय सेना की 7 तोपों से लिया जाता है, जिन्हें 25-पोंडर्स कहते हैं, जो प्रत्येक तीन राऊंड चलाती हैं।

– सेना का हर सदस्य जो मार्च में हिस्सा लेता है, उसे जांच की चार परतों से गुजरना पड़ता है। इसके अतिरिक्त उनके हथियारों की गहन जांच की जाती है यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनमें जीवित गोलियां न हों।