
भारत की महान संस्कृति में मनुष्य मात्र के लिए लौकिक तथा पारलौकिक अभ्युदय के साथ यथार्थ सुख शांति-एवं आत्म-कल्याण का अमर संदेश निहित है। पुराणों एवं शास्त्रों में भगवत पूजन, व्रत, दान व तीर्थ आदि की बड़ी महिमा बताई गई है।
कार्तिक मास क्यों है श्रेष्ठ
कार्तिक मास में तैंतीस करोड़ देवी-देवता मनुष्य के सन्निकट हो जाते हैं। भगवान विष्णु के अतिप्रिय इस माह में भगवान विष्णु जी के उद्देश्य से मनुष्य जो कुछ भी दान करता है उसे वह अक्षय रूप में प्राप्त करता है। जैसे सत्युग के समान कोई युग नहीं, वेदों के समान कोई शास्त्र नहीं है तथा गंगा जी के समान कोई तीर्थ नहीं, वैसे ही कार्तिक माह के समान कोई माह नहीं है।
कब और कैसे रखें कार्तिक व्रत
कार्तिक का व्रत आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी से प्रारंभ करके इसको कार्तिक शुक्ला दशमी को समापन करने का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त आश्विन की पूर्णिमा को प्रारंभ कर कार्तिक की पूर्णिमा को पूर्ण करें। श्री कृष्ण भक्त, सूर्य भक्त, गणेश भक्त, शक्ति उपासक, शिवोपासक और वैष्णव सभी को सब पापों का निवारण करने के लिए इस व्रत को धारण करना चाहिए जो आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक कार्तिक व्रत की समाप्ति करता है, वह भगवान जनार्दन को प्रसन्न करता है।
भगवती दुर्गा के उपासक द्वारा आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की महारात्रि आने तक स्नान कर दुर्गा जी को प्रसन्न किया जा सकता है। कार्तिक माह में तुलसी वृक्ष के नीचे राधा-कृष्ण जी का निष्काम भाव से पूजन करना चाहिए। यदि तुलसी के वृक्ष का अभाव हो तो पूजन आंवले के वृक्ष के नीचे किया जा सकता है। मुख्य पूजा सूर्यमण्डल की ओर देखकर की जानी चाहिए।
अकाशदीप की श्रेष्ठता
कार्तिक माह प्रात: स्नान से निवृत्त हो जो अकाशदीप का दान करता है वह सब लोकों का स्वामी और सब सम्पत्तियों से सम्पन्न होकर इस लोक में सुख भोगता है तथा मोक्ष को प्राप्त करता है। महाराज सुनन्द ने चन्द्र शर्मा नामक ब्राह्मण के बताए अनुसार एक मास तक स्नान से निवृत्त होकर तुलसीदलों से भगवान विष्णु की पूजा कर अकाशदीप किया। इस पुण्य के प्रभाव से वह हजारों वर्ष पृथ्वी पर शासन कर परिवार सहित सुन्दर विमान में सवार होकर विष्णु लोक पधारे। यह मंत्रोच्चारण करें-
नम: पितृभ्य: प्रेतेभ्यो नमो धर्माय विष्णवे।
नमो यमाय रुद्राय कान्तारपतये नम:।।
तुलसी पूजन एवं कार्तिक माह
क्षीरसागर मंथन पर अजरता और अमरता प्रदान करने वाले उस अमृत कलश को भगवान विष्णु हर्षित मुद्रा में पकड़े हुए थे। उनके नेत्रों से आनन्दाश्रु की कुछ बूंदें उस अमृत के ऊपर गिरीं। उनसे तत्काल ही मण्डलाकार तुलसी उत्पन्न हुई। सागर मंथन से पैदा लक्ष्मी तथा तुलसी को ब्रह्मा आदि देवताओं ने श्रीहरि की सेवा में समर्पित किया और भगवान ने उन्हें ग्रहण कर लिया। तब से तुलसी श्री विष्णु को अत्यंत प्रिय करने वाली हो गई। सम्पूर्ण देवता भगवतप्रिया तुलसी की विष्णु जी के समान ही पूजा करते हैं। तुलसी पाप का नाश करने वाली तथा पुण्य की वृद्धि करने वाली है। जिस घर में तुलसी का वास होता है वह घर तीर्थ के समान होता है। जहां तुलसीवन की छाया होती है, वहीं पितरों की तृप्ति के श्राद्ध करने चाहिएं।
कार्तिक माह में आंवला पूजन
ब्रह्मा जी द्वारा उत्पन्न आंवले के वृक्ष की महिमा के बारे में कहा जाता है कि इसके स्मरण मात्र से मनुष्य गोदान का फल प्राप्त करता है। इसके दर्शन से दोगुणा और इसके फल सेवन से तिगुना पुण्य होता है। जो मनुष्य कार्तिक माह में आंवले के वन में भगवान श्रीहरि की पूजा तथा आंवले की छाया में भोजन करता है उसका पाप नष्ट हो जाता है। प्राचीन काल में कावेरी के उत्तर तट पर रहने वाले विद्वान ब्राह्मण देव शर्मा ने अपने धर्म से विमुख रहने वाले पुत्र को कार्तिक माह में स्नान, दान, व्रत और नियमों का पालन करने को कहा।
पुत्र ने पिता की निंदा करनी प्रारंभ कर दी। पिता देव शर्मा ने क्रोधित होकर श्राप देते हुए कहा, ‘जा वृक्ष के खोखले में चूहा हो जा।’ श्राप के भय से डरे पुत्र ने अपने पिता से इससे मुक्त होने की प्रार्थना की। देव शर्मा ने अपने पुत्र को बताया-‘जब तुम भगवान को प्रिय लगने वाले कार्तिक व्रत का पवित्र महात्म्य सुनोगे, उस समय श्रवण मात्र से तुम्हारी मुक्ति हो जाएगी। ऐसा कहते ही पुत्र चूहा हो गया तथा वर्षों तक सघन वन में निवास करता रहा। एक दिन कार्तिक माह में विश्वामित्र अपने शिष्यों सहित वन में से गुजर रहे थे।
उन्होंने नदी में स्नान उपरांत भगवान की पूजा करके आंवले की छांव में बैठ अपने शिष्यों को कार्तिक माह का महात्म्य सुनाया। उसी समय एक दुराचारी व्याध की प्राणियों की हत्या करने की इच्छा अलोप हो गई। सुबुद्धि जाग उठी। व्याध ने भी इस माह की महिमा श्रवण की। श्राप से चूहे बने ब्राह्मण पुत्र ने भी इस माह की महिमा सुनी। वह चूहे का शरीर छोड़कर तत्काल दिव्य देह से युक्त हो गया और विष्णु लोक गमन किया।
इस माह में आंवले एवं तुलसी की माला धारण करने से अनन्त पुण्य की प्राप्ति होती है। लक्ष्मी प्राप्ति की इच्छा रखने वाले प्राणी को नवमी, अमावस्य, सप्तमी, संक्रांति दिन, रविवार, चन्द्रग्रहण एवं सूर्यग्रहण को छोड़कर अन्य दिन आंवलों से स्नान करना चाहिए। इससे चौरासी के कुचक्र से मुक्ति भी मिलती है। कार्तिक के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को आंवले का पूजन अतिहितकारी है। इस चतुर्दशी को बैकुण्ठ चतुर्दशी भी कहा जाता है।
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