Last Updated: October 9, 2026

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भाग्योदय के बिना नहीं मिलता मनचाहा फल

December 28, 2023

भाग्योदय के बिना नहीं मिलता मनचाहा फल

हम अपने आसपास देखते हैं कि कुछ लोगों को पैदा होते ही सब सुखसुविधाएं, ऐशो-आराम मानो थाली में परोसे हुए भोजन की तरह सरलता से उपलब्ध हो जाते हैं। जिस भी कार्य को वे हाथ में लेते हैं, उसमें सफल हो जाते हैं यानी मिट्टी को भी यदि वे हाथ लगा लेते हैं तो वह मिट्टी सोना उगलने लग जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो थोड़े से परिश्रम से ही उन्हें अधिक लाभ की प्राप्ति हो जाती है। धीरे- धीरे उन्हें सफल होने की बहुत अधिक आदत हो जाती है। तब ऐसा लगने लगता है कि शायद अपने जीवन में वे हार शब्द का अर्थ ही नहीं जानते।

दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी देखे जाते हैं जो अपना सारा जीवन एड़ियां रगड़ते मर जाते हैं परन्तु उन्हें दो जून की रोटी भी नसीब नहीं हो पाती। उनका सम्पूर्ण जीवन संघर्ष करते हुए ही बीत जाता है। न वे अपनी और न ही अपनों की जरूरतों को ही पूरा कर पाते हैं। इसलिए वे समाज में अपना स्थान नहीं बना पाते। जिस काम में वे हाथ डालते हैं, उन्हें असफलता का ही मुंह देखने को मिलता है। ऐसा लगने लगता है मानो निराश या असफलता का और इनका चोलीदामन का साथ है।

ऐसी विरोधाभासी स्थितियां प्राय: हमें अपने आसपास दिखाई देती रहती हैं जिनको देखकर सबके हृदयों को ये प्रश्न सदा उद्वेलित करते रहते हैं कि मनुष्य का उद्यम बलवान होता है अथवा उसका भाग्य? क्या वह अपनी सुख-समृद्धि को परिश्रम से प्राप्त करता है या फिर भाग्य से? क्या परिश्रम के बिना भाग्य कभी फलदायी नहीं हो सकता? इन प्रश्नों के उत्तर में हम एक उदाहरण देखते हैं। प्राय: हम सभी का किसी-न-किसी बैंक में लॉकर तो होता ही है। उस लॉकर की दो चाबियां होती हैं। एक हमारे पास रहती है और दूसरी बैंक के मैनेजर के पास।

इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि हमारे पास जो चाबी है वह है परिश्रम की और मैनेजर के पास जो चाबी है, वह हमारे भाग्य की है। जब तक दोनों चाबियां एकसाथ नहीं लगाई जातीं लॉकर का ताला नहीं खुल सकता। मनुष्य एक कर्मयोगी पुरुष है और यहां मैनेजर को हम भगवान मान सकते हैं। मनुष्य को अपनी चाबी लगाते रहना चाहिए। पता नहीं ऊपर वाला कब अपनी चाबी लगा दे। कोई नहीं जानता कि शायद भगवान अपनी भाग्यवाली चाबी लगा रहा हो और हम अपनी परिश्रम वाली चाबी किसी भी कारण से न लगा पा रहे हों।

अनजाने में इस प्रकार का व्यवहार करने से शायद हमारे सौभाग्य का ताला खुलने से ही रह जाए। इसका तात्पर्य यही होता है कि मनुष्य कितना भी पुरुषार्थी क्यों न हो, जब तक उसका भाग्योदय नहीं हो जाता तब तक उसे मनचाहा फल नहीं मिल सकता। इसी प्रकार यदि मनुष्य हाथ पर हाथ रखकर भाग्य के भरोसे बैठ जाए तब भी उसे सफलता नहीं मिल सकती। मनुष्य को कुछ भी पाने के लिए पुरुषार्थ तो करना ही पड़ता है। अपनी तरफ से मनुष्य को सदा उद्यम करते ही रहना चाहिए, समय आने पर उसका फल उसे स्वत: ही प्राप्त हो जाता है।

मनीषियों का कथन स्पष्ट करता है कि मनुष्य पूर्वजन्मों में जो भी सद्कर्म या दुष्कर्म करके आता है, उसी के अनुरूप उसे जीवन में सुखोपभोग अथवा दुख-परेशानियां मिलती हैं। उसके वही कर्म उसका भाग्य बनते हैं जो समयानुसार बिनकहे और बिन मांगे उसे मिलते हैं। मनुष्य का यही भाग्य उस समय सोने पर सुहागा बन जाता है जब वह परिश्रम करता है। यह निश्चित है कि बिना परिश्रम किए मनुष्य का भाग्य फलदायी नहीं हो सकता। अपना भाग्योदय करने के लिए सद्कर्मों की पूंजी का संशय करना बहुत आवश्यक है।

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