नई दिल्लीः पंजाब से राज्यसभा सदस्य डॉ. विक्रमजीत सिंह साहनी ने आज संसद में उच्च शिक्षा पर होने वाले खर्च पर चिंता जताई और इसे नियमित करने की मांग की हैं। डॉ. साहनी ने कहा कि शिक्षा एक मौलिक अधिकार है, लेकिन “केजी से पीजी तक” शिक्षा की बढ़ती लागत परिवारों पर भारी वित्तीय दबाव डाल रही है। भारत में स्नातकोत्तर तक एक छात्र को शिक्षित करने की लागत औसतन लगभग 25 रुपए है।
30 लाख तक का यह वित्तीय बोझ घरेलू शिक्षा की उच्च लागत के कारण कई छात्रों को विदेश में पढ़ने के लिए मजबूर कर रहा है, खासकर चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में। शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने जवाब दिया कि पंजाब और केरल ने आरटीई अधिनियम, 2009 की धारा 12 (1) (सी) को लागू नहीं किया है, जिसमें आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए कम से कम 25% निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में आरक्षण अनिवार्य हैं।
उच्च शिक्षा के लिए निजी कॉलेजों और डीम्ड विश्वविद्यालयों की फीस को नियंत्रित करने के लिए कोई नियम नहीं हैं। डॉ. साहनी ने इस बात पर प्रकाश डाला कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का आदेश देता है, लेकिन इस प्रावधान के कार्यान्वयन का आकलन करने की गंभीर आवश्यकता है। उन्होंने सवाल किया कि वर्तमान में इस मुफ्त शिक्षा से कितने बच्चे लाभान्वित हो रहे हैं और सरकार से कवरेज में किसी भी कमी को दूर करने का आग्रह किया।
मेष: दिन शुभ रहेगा...