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पंचशील सिद्धांत है समय की परीक्षा से झेला सामान्य मूल्य  

April 7, 2025

पंचशील सिद्धांत है समय की परीक्षा से झेला सामान्य मूल्य  

अप्रैल 1955 में नई दिल्ली में आयोजित एशियाई राष्ट्र सम्मेलन और फिर इंडोनेशिया के बांडुंग में आयोजित एशियाई-अफ्रीकी राष्ट्र सम्मेलन में, चीन, भारत और अन्य देशों के नेताओं द्वारा समर्थित “शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांतों” को औपचारिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के बीच आपसी समझ और सह-अस्तित्व के सिद्धांतों के आधार के रूप में स्थापित किया गया था। पंचशील सिद्धांत विश्व के लिए शांति कूटनीति का प्रकाश-स्तंभ बन गए हैं। तब से, दुनिया के विभिन्न देशों को सैन्य संघर्षों के बजाय शांतिपूर्ण वार्ता के माध्यम से राष्ट्रीय विवादों को हल करने का अहम कूटनीतिक तरीका प्राप्त हुआ। बीते 70 वर्षों के उतार-चढ़ाव के बाद, पंचशील सिद्धांतों ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, अर्थव्यवस्था और व्यापार जैसे अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में कठोर परीक्षणों को झेला है, और सार्वभौमिक सत्य साबित हुए हैं।

लेकिन, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में हमेशा कुछ व्यक्ति हैं जो चीन और भारत के नेताओं द्वारा वकालत किए गए पंचशील के प्रति अपमानजनक रवैया अपनाते हैं, और इसके बजाय तथाकथित “सामान्य मूल्य” अवधारणा को बढ़ाते हैं, साथ ही तथाकथित “इंडो-पैसिफिक रणनीति” और “क्वाड” आदि को भी समर्पित करते हैं। पर अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के विकास ने यह साबित कर दिया है कि विकासशील देशों के लिए कौन दुश्मन हैं और कौन दोस्त, यह एक विचारणीय प्रश्न है। सतह पर, यूरोप में उत्पन्न संसदीय लोकतंत्र को कई विकासशील देशों के द्वारा अपनाया गया है, इसलिए ऐसा लगता है कि वे समान मूल्यों को साझा करते हैं। लेकिन, यह सतही समानता इस क्रूर वास्तविकता को नहीं छिपा सकती कि विकासशील देश अंतर्राष्ट्रीय उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला में वंचित और निम्न स्तर की स्थिति में हैं। आधुनिक काल की शुरूआती में, ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने दुनिया के अधिकांश हिस्सों पर शासन कायम कर दिया था। उन्होंने मूल निवासियों का क्रूरतापूर्वक नरसंहार करने और उनकी भूमि पर कब्जा करने के आधार पर अपनी समृद्ध सभ्यता स्थापित की थी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व दो प्रमुख खेमों में विभाजित हो गया: विकसित देश और विकासशील देश। पर अंतर्राष्ट्रीय शक्ति के पिरामिड में, अमेरिका और पश्चिम पिरामिड के शीर्ष पर बैठते हैं, जबकि विकासशील देशों को धन तैयार करने की दयनीय स्थिति में रहना पड़ता है। इन  दो खेमों के बीच वास्तव में समान संबंध कैसे हो सकता है!

वैश्वीकरण को बढ़ावा देने में अमेरिका का मूल उद्देश्य वैश्वीकरण के माध्यम से ऐसी विश्व संरचना को मजबूत करना है, जिसमें विकसित देश उच्च प्रौद्योगिकी पर एकाधिकार कर लेते हैं और विकासशील देश प्राथमिक उत्पादों के प्रदाता बन जाते हैं। पर जब वैश्वीकरण पश्चिमी इच्छाओं के अनुसार आगे नहीं बढ़ रहा है, तो वह ऐसे वैश्वीकरण को कमजोर करने के लिए कदम उठाने में संकोच नहीं करेगा। जभी कोई देश इस हद तक विकसित हो जाता है कि वह अमेरिकी आधिपत्य को चुनौती देने लगे, तो अमेरिका उसे दबाने की पूरी कोशिश करेगा। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में हम किस के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के मार्ग पर बढ़ सकते हैं? यह एक गम्भीर विचारणीय प्रश्न है। किसी देश को देखते समय हमें उसके इतिहास के साथ-साथ उसकी प्रकृति को भी देखना चाहिए। नये चीन की स्थापना के बाद से, चीन सरकार ने हमेशा शांति और सहयोग की विदेश नीति का पालन किया है, और हमेशा अन्य देशों के साथ समानता से राजनीतिक, आर्थिक और व्यापारिक संबंध विकसित किए हैं। चाहे वह ब्रिक्स और शांघाई सहयोग संगठन की स्थापना करना हो, या “बेल्ट एंड रोड” पहल का प्रस्ताव करना हो, चीन के दूसरे देशों के साथ सहयोग कभी भी अन्य देशों के हितों को खतरे में डालने पर आधारित नहीं है।

यह कोई संयोग नहीं है कि चीन और भारत ने सबसे पहले शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांतों का प्रस्ताव रखा। चीन और भारत दोनों में प्राचीन काल से ही वसुधैव कुटुम्बकम्  की विचारधारा उत्पन्न हुई थी। दोनों देशों की पारंपरिक संस्कृतियों के साथ-साथ बौद्ध धर्म, ताओवाद और हिंदू धर्म सभी विश्व शांति की अवधारणा को एक सामाजिक रूप मानते हैं, जिसे भविष्य की दुनिया में अनिवार्य रूप से साकार किया जाएगा। ऐसी सांस्कृतिक परंपरा न केवल विभिन्न सभ्यताओं के बीच सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा देती है, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व की भी वकालत करती है। पूर्वी सभ्यता की यह मूल्य प्रणाली शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांतों में परिलक्षित होती है। विभिन्न विचार अनिवार्यतः विभिन्न व्यवहारों को जन्म देंगे। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांतों का सार्वभौमिक महत्व इस बात में निहित है कि किसी भी देश का उत्थान युद्ध और लूटपाट के माध्यम से नहीं हो पाएगा।

(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप  ,पेइचिंग)

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