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बेजुबानों का मसीहा: जानिए ऐसे डॉक्टर के बारे में जिसने मात्र 50 रुपए के अपने डिवाइस से दी कई बेजुबानों को आवाज़

April 20, 2025

बेजुबानों का मसीहा: जानिए ऐसे डॉक्टर के बारे में जिसने मात्र 50 रुपए के अपने डिवाइस से दी कई बेजुबानों को आवाज़

डॉक्टर को भगवान का रूप माना जाता हैं और कई डॉक्टर ऐसे हैं जो इसे बात को सच बनाकर लोगों के सामने पेश करते हैं. डॉक्टर विशाल राव एक ऐसा ही नाम हैं. जिन्होंने अपने एक छोटे से कदम से उन लोगों को एक नई आवाज़ दी जो गले के कैंसर के चलते बेजुबान हो गए थे। गले का कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसमें अमूमन मजबूरन ऑपरेशन करवाना ही पड़ता है. ऑपरेशन की यह प्रक्रिया बहुत ही कठिन होती है और इसके चलते मरीज़ के गले से वॉइस बॉक्स निकालना पड़ता है इस वॉइस बॉक्स के बाहर निकलते ही मरीज़ अपनी बोलने की शक्ति खो बैठता है. जिस व्यक्ति ने पूरी जिंदगी बोला हो और जब वह एक पल में बोलने की शक्ति खो बैठता है तो उसकी जिंदगी उस एक पल में ही बदल जाती है.

डॉक्टर विशाल राव ने अपने मेडिकल करियर में ऐसे न जाने कितने ही मरीज़ देखे जो ऑपरेशन के बाद बोल नहीं सके और उन्होंने अपनी आखों के सामने अपनी जिंदगी बिखरते हुए देखते है। यह सब देखकर डॉक्टर विशाल का दिल भी पसीज गया और उन्होंने यह ठाना की इन लोगों के लिए कुछ तो करके रहेंगे. बस फिर क्या था उस दिन के बाद से उन्होंने अपना यह काम शुरू कर दिया.

गले के कैंसर से जिन लोगों की आवाज़ चली जाती थी वो विदेशों से डिवाइस मंगाकर अपनी आवाज़ फिर वापस पा सकते थे. हालांकि, यह डिवाइस बहुत महंगे होते हैं. हर एक डिवाइस करीब 30 से 40 हज़ार रूपए का होता है जिसे थोड़े समय बाद बदलना पड़ता है. गरीब वर्ग के मरीज़ यह खर्च नहीं उठा सकते हैं इसलिए डॉक्टर विशाल ने सोचा क्यों न एक इसा डिवाइस बनाया जाए जिसे हर कोई खरीद सकता है.मगर बहुत ही कम दाम वाला ऐसा डिवाइस बनाना काफी मुश्किल काम था.

उन्होंने बिना कुछ सोचे इसपर काम करना शुरू कर दिया. वो साल 2016 था, जब विशाल एक बड़े हॉस्पिटल में काम कर रहे थे और इसी बीच उन्होंने एक रबर फैक्ट्री के मालिक शशांक से अपने डिवाइस को लेकर मीटिंग की. जब विशाल ने शशांक को अपनी सोच के बारे में बताया तो शशांक ने बिना कोई आनाकानी किए सीधा विशाल का साथ देने का फैसला कर लिया. दोनों ने मिलकर रिसर्च शुरू की. यह काम दिखने में आसान था मगर असल में यह बहुत लम्बा चला. अपने डिवाइस का पहला प्रोटोटाइप बनाने के लिए विशाल और शशांक को करीब 2 साल का वक्त लगा गया.

इस बीच उन्होंने कई सारे विदेशी डिवाइस की जांच की. उन्होंने इंजीनियरों से बात की. उन्होंने वह हर मुमकिन चीज़ की जिसकी मदद से वह इस डिवाइस को बना सकें. इस पूरी प्रक्रिया में वह कई बार फेल भी हुए मगर उन्होंने हार नहीं मानी. वह लगातार कोशिश में लगे ही रहे जब तक उन्होंने साल 2018 में अपना पहला प्रोटोटाइप तैयार नहीं कर लिया.

पहला प्रोटोटाइप तैयार करने के बाद सीधे ही विशाल ने उसका क्लिनिकल ट्रायल शुरू कर दिया. जब इस डिवाइस की टेस्टिंग की तो यह उम्मीद पर खरा उतरता हुआ दिखाई दिया. जैसे ही डिवाइस अपने टेस्ट में पास हुआ विशाल और शशांक ने इसका फाइनल मॉडल तैयार करना शुरू कर दिया. कुछ ही समय में इसका फाइनल मॉडल भी तैयार हो गया और उन्होंने इसे ‘ॐ’ नाम दिया.

यह नाम उन्होंने इसलिए चुना क्योंकि माना जाता है कि ॐ से ही श्रृष्टि में हर तरंग पैदा होती है. इस नाम के साथ ही डॉक्टर विशाल ने अपना ये डिवाइस मार्केट में उतार दिया. इतना ही नहीं उनकी इस कंपनी की वैल्यू आज 10 लाख की हो चुकी है और उनकी 12 लोगों की टीम अब तक 300 लोगों तक ये डिवाइस पहुंचा चुकी है.

उनका यह डिवाइस एक छोटी सी चीज़ है जिसे गले के कैंसर वाले मरीज के गले में फिट किया जाता है ताकि वह फिर से बोल सके. वॉइस बॉक्स हट जाने के बाद फ़ूड पाइप और विंड पाइप के बीच में गैप आ जाता है और उसी गैप के कारण मरीज़ बोल नहीं पाते हैं. उसी गैप को भरने का काम विशाल की ये मशीन करती है. इसे लगाना आसान है और एक बार लगाने के बाद यह 6 से 12 महीनों तक काम करती है.

विशाल और उनकी टीम ये डिवाइस बेचती है मगर साथ ही साथ वह लोगों से डोनेशन भी लेते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक वह ये डिवाइस पहुंचा सकें और ज्यादा से ज्यादा लोग अपनी परेशानियों से मुक्त हो पाएं. डॉक्टर विशाल ने अपने एक छोटे से कदम से जिस तरह से कई लोगों की आवाज़ वापस दिलाई है वह अपने आप में काबिले-तारीफ है. उनकी इस एक मुहीम से कई लोग वापस अपनी आवाज़ पा सकेंगे वह भी बुहत ही कम दाम में. शायद इसलिए ही डॉक्टर को भगवान का दूसरा रूप कहा जाता है.

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