Last Updated: November 7, 2026

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वॉलमार्ट का “शिपमेंट दोबारा शुरू करो” वाला नोटिस अमेरिका की टैरिफ पॉलिसी पर सवाल खड़े करता है!

May 1, 2025

वॉलमार्ट का “शिपमेंट दोबारा शुरू करो” वाला नोटिस अमेरिका की टैरिफ पॉलिसी पर सवाल खड़े करता है!

US Tariff Policy : अमेरिका ने जब से चीनी सामानों पर मनमाने और भारी-भरकम टैरिफ लगाना शुरू किया है, तब से तीन हफ्ते बीत चुके हैं। लेकिन इसी बीच एक दिलचस्प बात सामने आई है — वॉलमार्ट जैसे बड़े अमेरिकी रिटेलर्स ने चीन से सामान मंगवाने की तैयारी फिर से शुरू कर दी है। अब सवाल ये उठता है कि अगर टैरिफ इतने जरूरी और असरदार थे, तो फिर शिपमेंट दोबारा क्यों शुरू हो रही है?

हांगकांग के अखबार मिंग पाओ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण चीन के क्वांगचो शहर में चल रहे कैंटन फेयर में कुछ चीनी निर्यातकों ने बताया कि वॉलमार्ट, टारगेट और होम डिपो जैसे दिग्गज अमेरिकी रिटेलर्स ने उन्हें नोटिस भेजा है कि शिपमेंट फिर से शुरू करें। ये वही शिपमेंट है जो अमेरिका के भारी टैरिफ की वजह से रुकी हुई थी। हालांकि इन कंपनियों ने अभी आधिकारिक तौर पर इस खबर की पुष्टि नहीं की है।

कुछ दिन पहले ही इन कंपनियों के CEO अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से व्हाइट हाउस में मिले थे और टैरिफ के असर पर बातचीत की थी। साथ ही, वॉलमार्ट चाइना ने भी चीन की विदेशी व्यापार कंपनियों को सपोर्ट करने के लिए “ग्रीन चैनल” लॉन्च किया है। इससे एक बात तो साफ है— चाहे जितना भी टैरिफ लगा लो, चीन-अमेरिका के बीच का व्यापारिक रिश्ता इतनी आसानी से टूटने वाला नहीं है।

हालांकि ये अब तक साफ नहीं है कि रिटेलर्स का ये शिपमेंट नोटिस कितना बड़ा है या किस तरह के सामान पर लागू होगा। एक महीने पहले, वॉलमार्ट ने अपने चीनी सप्लायर्स से कीमत कम करने को कहा था क्योंकि टैरिफ की वजह से लागत बढ़ रही थी। इससे चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने वॉलमार्ट को बातचीत के लिए बुलाया था। इस पूरे घटनाक्रम से एक बात और साफ होती है— वॉलमार्ट जैसी ग्लोबल कंपनियों की नींव वैश्विकरण पर टिकी है। चीन से वॉलमार्ट हर साल करीब 100 अरब डॉलर का सामान खरीदता है, जो उसके कुल वैश्विक खरीदारी का करीब एक चौथाई है। ऐसे में अमेरिकी सरकार की टैरिफ पॉलिसी वॉलमार्ट के पूरे बिज़नेस मॉडल के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन गई है।

ये सिर्फ वॉलमार्ट का मामला नहीं है। अमेरिकी उपभोक्ता भी इन टैरिफ्स की मार झेल रहे हैं। सोचिए, अगर कोई अमेरिकी कंपनी चीन से 100 डॉलर का प्रोडक्ट इंपोर्ट करती है, तो उसे कस्टम डिपार्टमेंट को कम से कम 145 डॉलर टैरिफ देना पड़ता है। मतलब सीधा नुकसान या फिर प्रोडक्ट की कीमत इतनी बढ़ा देना कि आम लोगों के लिए खरीदना मुश्किल हो जाए।

अब वॉलमार्ट और बाकी रिटेलर्स के पास दो ही ऑप्शन हैं— या तो ऑर्डर रद्द कर दें या फिर ये बढ़ी हुई लागत सीधा ग्राहकों पर डाल दें। लेकिन ऐसा करना भी आसान नहीं है। इसलिए ये कंपनियाँ अब खुद टैरिफ का बोझ उठाने की बात कर रही हैं और व्हाइट हाउस तक में जाकर बात कर रही हैं कि उन्हें “मेड इन चाइना” प्रोडक्ट्स की ज़रूरत है, क्योंकि कम समय में इतने सस्ते और क्वालिटी वाले प्रोडक्ट्स कहीं और से मिलना मुश्किल है।

असल में, अमेरिका और चीन दोनों ही एक-दूसरे के साथ सालों से बिज़नेस करके फायदे में रहे हैं। अमेरिका चीन से न सिर्फ कंज़्यूमर प्रोडक्ट्स, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग और इंडस्ट्री में काम आने वाले मध्यवर्ती वस्तुएं और पूंजीगत उपकरण भी आयात करता है। इससे अमेरिका की सप्लाई चेन मजबूत होती है, सामान सस्ता मिलता है और लोगों की क्रय शक्ति बनी रहती है— खासतौर पर मध्यम एवं निम्न आय समूह के लिए।

लेकिन हाल के कुछ सालों में अमेरिका की सरकार ने संरक्षणवाद की राह पकड़ ली है। वो “मेड इन चाइना” टैग से इतना डर गई है कि लगातार टैरिफ बढ़ाती जा रही है। इसका सीधा असर ये हो रहा है कि दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध खतरे में पड़ गए हैं और फ्री मार्केट की अवधारणा कमजोर होती जा रही है।

सच बात तो ये है कि अमेरिका में “मेड इन चाइना” की मांग खत्म नहीं होने वाली। वैश्विकरण आज की ज़रूरत है, ट्रेंड है और एक ऐसा रास्ता है जो दुनिया को आगे ले जा रहा है। ऐसे में वॉलमार्ट का “शिपमेंट दोबारा शुरू करो” वाला नोटिस अमेरिका की टैरिफ पॉलिसी पर सवाल खड़े करता है। और ये सवाल जितना बड़ा है, उसका जवाब भी शायद वक्त ही देगा।

(लेखक: रमेश शर्मा)

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