‘दुनिया के मजदूरों एक हो’, ‘मजदूरों की भलाई’ जैसे कल्याणकारी नारों को याद दिलाता मई दिवस एक बार फिर बीत गया। जिस समय मजदूरों के हक-हकूक की चर्चा शुरू हुई, तब से लेकर दुनिया बहुत बदल गई है। श्रम कानूनों ने एक तरह से श्रमिकों की बजाय उद्योगपतियों और मालिकों का परोक्ष समर्थन शुरू कर दिया है। इसमें दो राय नहीं कि श्रम कानूनों के दुरूपयोग और ट्रेड यूनियनों की अराजकता ने ही श्रमिक हितों का सबसे ज्यादा नुकसान किया है। चाहे निजी क्षेत्र हो या फिर सरकारी, हर जगह मेहनताना की कटौती का दौर लगातार जारी है। इसकी वजह से समान कार्य, समान मजदूरी का सिद्धांत भी पीछे छूटता चला गया है। मई दिवस पर इसे समझने और बनी हुई समझ के जरिए श्रमिकों के हितों को तार्किक बनाने पर विचार किया जाना चाहिए।
जहां तक भारत की बात है, यहां सरकारी तंत्र के वेतन आयोग आज भारतीय व्यवस्था के लिए जरूरी उपकरण बन गया है। वेतन आयोग के चलते कुछ लाख कर्मचारियों के वेतन तो बढ़िया हो जाते हैं, लेकिन अब सरकारी विभाग भी रिटायर हो रहे लोगों की जगह नए कर्मचारियों की भर्ती के बजाय आउट सोर्स के जरिए कर्मचारी जुटा रहे हैं। आउटसोर्स के चलते कर्मचारियों को वही काम नियमित कर्मचारियों की तुलना में बहुत कम वेतन पर करना पड़ता है। नियमित कर्मचारियों को स्वास्थ्य, छुट्टी आदि की सहूलियतें भी मिलती हैं, जबकि आउटसोर्स कर्मचारी को ये सुविधाएं ना के बराबर मिलती हैं। उदाहरण के लिए केंद्र सरकार के किसी दफ्तर के नियमित चपरासी को औसतन पचास से साठ हजार रूपए महीने बतौर पगार मिलते हैं, वहीं उसकी तरह काम कर रहे आउट सोर्स कर्मचारी को बमुश्किल तेरह से लेकर सोलह हजार रूपए मिलते हैं। नियमित कर्मचारी अपनी नियमित नौकरी के चलते पानी तक पिलाने या चाय लाने से मना कर देता है, उसका प्रशासन कोई बालबांका भी नहीं कर पाता, जबकि आउट सोर्स कर्मचारी को औसतन दस से बारह घंटे और भाग-भाग कर काम करना पड़ता है। एक तरह से देखें तो यह व्यवस्था समान कार्य, समान वेतन के सिद्धांत का उल्लंघन हैं। दिलचस्प यह है कि गैरबराबरी और शोषण की इस व्यवस्था को सरकारी विभाग भी पूरी शिद्दत से जारी रखे हुए हैं।
दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में जीवन-यापन कितना मुश्किल है, इसी से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि इतने कम वेतन में कोई आउटसोर्स कर्मचारी कैसे अपनी जिंदगी गुजार रहा होगा।
सरकारी व्यवस्था में छंटनी की व्यवस्था के बाद ठेके पर नौकरियों की भी बहार आई हुई है। निजी ही नहीं, सरकारी क्षेत्र भी ठेके पर नौकरियां दे रहे हैं, क्योंकि काम उन्हें भी कराना है। लेकिन ठेका कर्मचारियों को अधिकांश जगह ना तो भविष्य निधि की सुविधा मिलती है और ना ही स्वास्थ्य सुविधा। उन्हें दुर्घटना बीमा तक की सुविधा नहीं है। कार्यालयों में जब अधिकार की बात आती है, सुविधाओं की बात होती है, महत्वपूर्ण जवाबदेही की बात होती है तो ठेके और आउटसोर्स कर्मचारियों को दरकिनार कर दिया जाता है, उन्हें बुनियादी सुविधाएं देने भी तंत्र आनाकानी करने लगता है। लेकिन जब जवाबदेही और काम की बात होती है तो सबसे पहले ठेके और आउटसोर्स कर्मचारियों को ही रखा जाता है।
दिलचस्प यह है कि बड़े कारपोरेट घराने, बड़ी कंपनियां और निजी क्षेत्र के बड़े प्रतिष्ठान भी इसी व्यवस्था को अपना रहे हैं। इससे उन्हें वेतन मद में खर्च होने वाली राशि बचती है। स्वास्थ्य और दूसरी सुविधाएं देने से भी वे आर्थिक बचत कर लेती हैं। दिलचस्प यह है कि कानून और व्यवस्था इस मसले पर चुप्पी साधे हुए है। चुनावी अभियान में ये समस्याएं मुद्दा नहीं बनतीं।
आज आर्थिकी के असमान और असंतुलित वितरण की चर्चा खूब हो रही है। साल-दर-साल आने वाली ऑक्सफैम की रिपोर्ट के बाद पता चलता है कि करोड़पतियों की संख्या तो बढ़ गई है, कुछ सौ परिवारों की संपत्तियां खूब बढ़ गईं, लेकिन देश की बड़ी आबादी की कमाई अब भी रोटी और कपड़े के संघर्ष से ही गुजर रही है। बड़ी आबादी का संघर्ष करोड़पतियों और बड़े रईसजादों की तुलना में कम नहीं हो रहा। बहुत कम लोग मानते हैं कि गैर बराबरी और संपत्ति के असमान वितरण के पीछे भी कहीं न कहीं समान कार्य, समान मजदूरी की व्यवस्था का सही से पालन नहीं होना भी है। समान कार्य, समान वेतन या मजदूरी की व्यवस्था के आलोक में देश की आर्थिकी को देखने और सोचने का वक्त आ गया है। अगर आर्थिकी इस नजरिए से आगे बढ़ी तो लोगों में तार्किक तरीके से समृद्धि आएगी। तब गैर बराबरी और असंतुलित आर्थिक वितरण की व्यवस्था भी बेहतर होगी। तब काम और प्रतिभा को उनके मेरिट पर महत्व मिलेगा। इसके बाद समाज में फालतू के तनावों के लिए गुंजाइश नहीं रह पाएगी। मई दिवस पर हमें इस नजरिए से सोचना और उसके नतीजों को अपनाना होगा।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक— उमेश चतुर्वेदी)
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