मई में जो हुआ, उसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से चल रही टैरिफ जंग आखिरकार एक समझौते की शक्ल में ढल गई। दोनों देशों ने तय किया है कि वे एक-दूसरे पर लगाए गए भारी-भरकम टैक्स यानी टैरिफ को कम करेंगे और बातचीत का एक स्थायी और ढांचा-बद्ध रास्ता फिर से शुरू करेंगे।
अब अमेरिका ने जहां चीनी सामानों पर टैक्स 145% से घटाकर 30% कर दिया है, वहीं चीन ने अमेरिकी सामानों पर लगने वाला टैक्स 125% से घटाकर सिर्फ 10% कर दिया है। लेकिन असली कहानी इन हेडलाइंस के नीचे छिपी है – ये समझौता भरोसे से नहीं, बल्कि ज़रूरत से हुआ है, और इसका असर सिर्फ दोनों देशों पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की इकॉनमी, बिज़नेस और राजनीति पर पड़ेगा।
पिछले कई सालों से अमेरिका और चीन की ये टैरिफ वॉर पूरी दुनिया के सप्लाई चेन को हिला रही थी, लागतें बढ़ रही थीं, और इंटरनेशनल ट्रेड में एक तरह की अनिश्चितता बनी हुई थी। टैरिफ अब सिर्फ एक इकॉनॉमिक हथियार नहीं रहे, बल्कि एक तरह की ज़िद और टकराव का प्रतीक बन चुके थे। ऐसे में जेनेवा में हुआ ये समझौता सिर्फ बिज़नेस की डील नहीं, बल्कि वर्ल्ड ट्रेड के सोचने के तरीके में बदलाव की शुरुआत है।
थोड़ी समझदारी, थोड़ा बदलाव
इस समझौते के पहले दिन ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे “बहुत अच्छी मीटिंग” बताया और कहा कि यह बातचीत “दोस्ताना और समझदारी से भरी शुरुआत” है। चीन की ओर से भी यह कदम सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। चीन पिछले कुछ सालों से अपनी ‘ड्यूल सर्कुलेशन’ स्ट्रैटेजी पर काम कर रहा है, जिसमें वो अपनी घरेलू मार्केट को मज़बूत करना चाहता है ताकि बाहर की दुनिया पर निर्भरता कम हो। लेकिन अमेरिका की टेक्नोलॉजी, फाइनेंस और कंज़्यूमर मार्केट तक पहुंच आज भी चीन की ग्रोथ के लिए बेहद ज़रूरी है।
चीन के एक्सपोर्टर्स, टेक कंपनियों और मैन्युफैक्चरर्स के लिए ये टैरिफ छूट किसी राहत से कम नहीं। चीन के कई प्रांत जैसे क्वांगतोंग और चच्यांग, जो एक्सपोर्ट पर टिके हैं, वहां की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव था। ऐसे में ये डील उन्हें विदेशी डिमांड फिर से पाने में मदद कर सकती है।
अमेरिका की सोच में बदलाव
वहीं अमेरिका को भी अब ये समझ में आ गया है कि चीन से पूरी तरह अलग होना आसान नहीं है। टैरिफ से थोड़ी बहुत पकड़ तो बनाई जा सकती है, लेकिन इससे ना तो ट्रेड घाटा कम हुआ और ना ही घरेलू इंडस्ट्री वापस आई। अब अमेरिका भी “पेनल्टी” से “प्रैक्टिकल अप्रोच” की तरफ बढ़ रहा है, यानि अब फोकस होगा मार्केट को स्थिर करने, महंगाई पर कंट्रोल करने और स्मार्ट कॉम्पटीशन के लिए ज़मीन तैयार करने पर।
अब अमेरिका और चीन के बीच एक नया ट्रेड कंसल्टेशन सिस्टम बनेगा, जिसमें दोनों देश या किसी तीसरे देश में मिल-बैठकर मसले सुलझाएंगे। वॉशिंगटन को अब भी नहीं लगता कि चीन उसकी शर्तों पर खुलेगा, लेकिन ये समझ आ गया है कि सीधा टकराव फायदेमंद नहीं, बातचीत ज़्यादा काम की है।
क्या ये मॉडल बन सकता है?
इस समझौते का मतलब ये नहीं कि मुकाबला खत्म हो गया है। बल्कि अब ये मुकाबला थोड़े ज़िम्मेदारी और नियम-आधारित तरीके से होगा। दोनों देशों के बीच टेक्नोलॉजी, सिक्योरिटी और इन्फ्लुएंस को लेकर मतभेद बने रहेंगे, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आपस में सहयोग नहीं हो सकता। अगर ये समझौता टिकता है, तो ये एक “मैनेज्ड रिलेशनशिप” का मॉडल बन सकता है जिसमें प्रतिस्पर्धा भी हो, लेकिन बातचीत की गुंजाइश भी बनी रहे।
इस पूरे घटनाक्रम से हमें एक पुराना सबक याद आता है– चाहे प्रतिस्पर्धा कितनी भी तीखी हो, लेकिन जब नुकसान ज़्यादा होने लगे, तो समझौते की ज़रूरत पड़ती ही है। अमेरिका और चीन की इकॉनॉमी एक-दूसरे से इतनी जुड़ी हुई हैं कि पूरी तरह से अलग होना ना मुमकिन है, ना समझदारी। जो अब उभर रहा है, वो किसी भोली-भाली ग्लोबलाइज़ेशन की वापसी नहीं, बल्कि एक शर्तों वाली, सावधानी से की गई साझेदारी है।
(अखिल पाराशर, चाइना मीडिया ग्रुप (CGTN हिन्दी), बीजिंग)
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