इंटरनेशनल डेस्क : 13 जून 2025 से ईरान और इजरायल के बीच शुरू हुई भीषण जंग रुक गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सीजफायर के ऐलान के बाद दोनों देशों ने हमले रोक दिए हैं। इजरायल ने ऑपरेशन राइजिंग लायन के तहत ईरान के सैन्य, परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया। अमेरिका ने भी ऑपरेशन मिडनाइट हैमर चलाकर ईरान के परमाणु ठिकानों पर निशाना साधा। कई मोर्चों पर ईरान कमजोर स्थिति में दिखा। उसे रूस और चीन का साथ नहीं मिला। न ईरान अपने एयर स्पेस को सुरक्षित रख सका, न उसकी मिसाइलें कुछ खास कर पाईं। ईरान को जंग से कई सबक मिले।
ईरान रूस और चीन को रणनीतिक साथी मानता है। रूस खुद यूक्रेन जंग में फंसा रहा, सैन्य मदद के बजाय अमेरिकी हमलों की निंदा रूस ने की। चीन भी मदद को आगे नहीं आया। ईरान से तेल आयात करने वाला चीन शांति की अपील करता दिखा। इससे स्पष्ट है कि ईरान को इन दोनों के भरोसे रहने के बजाय खुद को मजबूत करने पर ध्यान देना होगा। अपनी रक्षा प्रणाली विकसित करने के साथ पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधारने होंगे।
ईरान की S-300, बावर-373 और अन्य रक्षा प्रणालियां इजरायल को रोकने में नाकाम दिखीं। पहले 24 घंटे में ही इजरायल ने उसकी 120 रक्षा प्रणालियों को तबाह कर दिया। इजरायल के लगभग सभी ड्रोन टारगेट हिट करने में कारगर रहे। ईरान की वायुसेना भी जंग में कमजोर साबित हुई। आधुनिक युग में युद्ध जीतने के लिए वायुसेना अहम है। ईरान को खुद की स्वदेशी तकनीक को मजबूत करना होगा। माना जाता है कि ईरान के पास 2000 बैलिस्टिक मिसाइलें हैं।
ईरान ने जंग में लगभग 1 हजार ड्रोन्स, 450 मिसाइलें दागीं। इजरायल ने लगभग 90 फीसदी मिसाइलों को रोक लिया। ईरान को अपनी मिसाइलों को और डेवलप करने की जरूरत है। ईरान का जासूसी नेटवर्क और आंतरिक सुरक्षा कमजोर दिखी। जंग में उसके कई IRGC कमांडर और परमाणु वैज्ञानिक मारे गए। मोसाद ने ईरान की सटीक खुफिया जानकारियां जुटाईं, जबकि ईरानी एजेंसियां उतना असर नहीं दिखा पाईं।
ईरान का साइबर सुरक्षा नेटवर्क भी कमजोर साबित हुआ। रणनीति के तहत ईरान को लग रहा था कि जंग में हमास, हिजबुल्लाह और हूती उसकी मदद करेंगे। हूती विद्रोहियों ने इजरायल पर मिसाइलें भी दागीं, लेकिन कोई खास असर नहीं दिखा। ईरान को अपनी कूटनीतिक समीक्षा करने की जरूरत भी है।
मेष: दिन शुभ रहेगा...