Vasudev Dwadashi : आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि 7 जुलाई को वासुदेव द्वादशी के रूप में मनाई जाएगी। यह पावन दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को समर्पित है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, संतान सुख की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
व्रत का महत्व-
शास्त्रों के अनुसार महर्षि नारद ने मां देवकी को इस व्रत का महत्व बताया था। वासुदेव द्वादशी का व्रत देवशयनी एकादशी के अगले दिन मनाया जाता है। इस साल यह सोमवार को पड़ रहा है, जिससे यह और भी शुभ हो जाता है। इस दिन सूर्योदय सुबह 5:29 बजे और सूर्यास्त शाम 7:23 बजे होगा। राहुकाल सुबह 7:14 बजे से रात 8:58 बजे तक रहेगा, इस दौरान पूजा करने से बचना चाहिए। अनुराधा नक्षत्र और वृश्चिक राशि में चंद्रमा का भ्रमण इस दिन को और अधिक शुभ बनाता है।
पूजा विधि-
पुरातन ग्रंथों में वासुदेव द्वादशी के व्रत और पूजा विधि के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है। इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान वासुदेव और देवी लक्ष्मी की प्रतिमा को पंचामृत और गंगाजल से स्नान कराने के बाद लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान को भोग लगाना चाहिए। इसके बाद भगवान को फूल, मौली, रोली, हल्दी आदि अर्पित करनी चाहिए और धूप-दीप जलाकर खीर या मिठाई का भोग लगाना चाहिए।
भगवान के समक्ष ध्यान करने के बाद देवी लक्ष्मी को समर्पित कनकधारा का पाठ करना चाहिए और फिर नारायण के लिए विष्णु सहनम का पाठ करना चाहिए। इसके बाद ब्राह्मण को दान देने का भी विशेष महत्व माना जाता है, जो बहुत शुभ होता है।
संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वालो के लिए लाभकारी-
शास्त्रों के अनुसार यह व्रत मोक्ष दिलाने वाला और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है। यह व्रत विशेष रूप से संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपत्तियों के लिए लाभकारी होता है। इस दिन भगवान शिव की पूजा करना भी विशेष शुभ माना जाता है, क्योंकि द्वादशी तिथि को शिव का वास होता है और यह दिन सोमवार को पड़ता है।
मेष: दिन शुभ रहेगा...