मीडिया में काम करते हुए मैंने नहीं सोचा था कि कभी मेरी बिज़नेस ट्रिप मुझे शांगहाई ले जाएगी! वो भी शांगहाई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल को कवर करने के लिए। भारतीय फिल्मों की खबरें देखते, पढ़ते अक्सर कान्स, टोरंटो या बर्लिन का ज़िक्र सुना था, लेकिन शांगहाई? मेरे लिए यह सिर्फ चीन का एक बड़ा शहर था, तब तक जब तक मैंने इसे अपनी आंखों से नहीं देखा।
फास्ट ट्रेन से पेइचिंग से शांगहाई तक और स्टेशन से अपने होटल तक शांगहाई मेट्रो के सफर के दौरान मैंने पहली बार शांगहाई की रफ्तार को महसूस किया। चौड़ी सड़कों पर चमचमाती गाड़ियां, आसमान छूती इमारतें और बीच-बीच में अचानक दिखते पुराने शांगहाई के लालटेन और पारंपरिक छतों वाले घर, एक शहर को जानने की मेरी उत्सुकता और भी बढ़ गई थी।
मेरा होटल क्राउन प्लाज़ा के पास था, जो शांगहाई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का प्रमुख आकर्षण था। होटल से क्राउन प्लाज़ा तक का रास्ता सफर की थकान को भुला देने वाला था। फिल्म फेस्टिवल की मीटिंग्स, स्क्रीनिंग्स और इंटरव्यूज़ के बीच मैं जब-जब शहर में घूमी, मैंने एक नई दुनिया का अनुभव किया।
फेस्टिवल के दौरान विभिन्न देशों के फिल्म जगत के लोगों से मुलाकात हुई। वे मुझसे भारत के बारे में पूछते ‘क्या तुम बॉलीवुड से हो?’, ‘क्या तुमने आमिर खान को देखा है?’ मुझे हंसी आती थी, लगा जैसे फिल्मों ने दो संस्कृतियों के बीच एक पुल खींच रखा है।
एक शाम मेरी चीनी सहकर्मी और मेरे साथ शांगहाई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल को कवर करने आई मेरी साथी आशा मुझे लेकर पुराने शहर के युयुआन गार्डन गईँ। लाल लटके हुए लालटेन, पुराने चीनी घरों के बीच आधुनिक कैफे, वो जगह किसी फिल्म के सेट जैसी थी। वहां घूमते हुए मैं बनारस की गलियों और घाटों को याद कर रही थी। कैसे पुराने और नए का ऐसा मेल वहां भी दिखता है। आशा ने एक कुशल गाइड की तरह मुझे वहां की हर चीज़ के बारे में बताया।
युयुआन गार्डन में हजारों साल पुरानी स्थापत्य कला, पेड़ों से छनती सूरज की किरणें और दीवारों पर उकेरे गए ड्रैगन, सब कुछ मुझे बनारस की गलियों की याद दिला गया। फर्क सिर्फ इतना था कि यहां मंदिरों की जगह बौद्ध पगोडा थे और डंपलिंग्स ने समोसे की जगह ले ली थी।
मुझे समझ आया कि यह शहर जितना तेज़ है, उतना ही गहरा भी। मॉडर्न शांगहाई के ऊंचे टॉवर्स की रोशनी से लेकर प्राचीन शांगहाई की संकरी गलियों तक, हर कोना एक कहानी कहता है। मुझे शांगहाई ने एक अनोखा तोहफा दिया। दो दुनियाओं को एक साथ जीने का मौका। यहाँ हाई-टेक मेट्रो और QR कोड से भरी ज़िन्दगी के बीच भी लोग अपनी परंपराओं से जुड़े हैं।
फेस्टिवल की भागदौड़ के बीच एक शाम हमने शांगहाई बंड का दौरा भी किया। उस पार पुडोंग के स्काईस्क्रेपर मेरी आंखों में जगमगा रहे थे, और इस पार ऐतिहासिक बिल्डिंग्स की कतारें खड़ी थीं जैसे इतिहास कह रहा हो। ‘हम यहीं हैं, सिर्फ रूप बदल गया है।’
मैंने बंड पर बैठकर ह्वांगफू नदी के पार देखा। उधर पीपुल्स स्क्वायर है, इधर पुडोंग के चमकते टावर। जैसे ये शहर बता रहा हो कि “आधुनिकता और परंपरा एक साथ कैसे चलती है”। एक शहर जो जड़ों से भी जोड़ता है और नए पंख भी देता है।
शांगहाई फिल्म फेस्टिवल ने मुझे सिर्फ नए कॉन्टैक्ट्स और प्रोजेक्ट्स ही नहीं दिए, बल्कि ये एहसास भी दिया कि शांगहाई कोई कोरा बिज़नेस हब नहीं है। ये शहर वो जगह है जहां लोग अपनी पुरानी कहानियों को नए पर्दों पर उतारते हैं। तकनीक से सजे इस शहर के दिल में सदियों पुरानी सभ्यता की धड़कन आज भी साफ सुनाई देती है।
फिल्म फेस्टिवल कवर करने के बाद जब मैं पेइचिंग के लिए रवाना हुई, तो मेरी डायरी में सिर्फ मीटिंग नोट्स ही नहीं थे, उसमें शांगहाई की गलियों की खुशबू, बंड की ठंडी हवा, और वो मुस्कुराते चेहरे भी दर्ज थे जिन्होंने मुझे सिखाया कि एक शहर सिर्फ इमारतों से नहीं बनता। वो कहानियों से बनता है, और शांगहाई के पास कहानियों की कोई कमी नहीं।
(दिव्या पाण्डेय – चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)