27 जुलाई को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका सरकार चीन के साथ समझौते के “बहुत करीब” है। राष्ट्रपति ट्रम्प की यह कूटनीतिक बयानबाजी अभी भी लोगों के कानों में गूंज रही है, जबकि स्वीडन के स्टॉकहोम में आयोजित चीन-अमेरिका आर्थिक व व्यापारिक वार्ता की मेज पर अतिरिक्त टैरिफ, दुर्लभ मृदा, चिप्स और टिकटॉक के स्वामित्व से जुड़ी एक जटिल प्रश्नावली चुपचाप रखी गई है।
जब अमेरिकी वाणिज्य मंत्रालय ने इस बार की वार्ता का माहौल बनाए रखने के लिए जानबूझकर चीन पर प्रौद्योगिकी निर्यात नियंत्रण को रोका और अमेरिका के पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मैथ्यू पोटिंगर समेत कुछ अमेरिकी सुरक्षा विशेषज्ञों व अधिकारियों ने इस बात के प्रति अमेरिका की “रणनीतिक गलतियों” की निंदा की, तो इस खेल का नाटक व्यापार से कहीं आगे निकल गया।
वार्ता की मेज़ पर चल रही बहस के पीछे, वैश्विक अर्थव्यवस्था की चिंताएं गूंज रही हैं। जब अमेरिका सरकार ने कनाडा, मैक्सिको और भारत आदि देशों को “अल्टीमेटम” जारी किया और यूरोपीय संघ ने अनिच्छा से कहा कि 15 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ के सामने उसके पास “कोई विकल्प नहीं” है, तो वैश्विक व्यापार प्रणाली की नसें लंबे समय से तनावग्रस्त रही हैं। जैसा कि फिनलैंड के विदेश व्यापार और विकास मंत्री वीर तावियो ने कहा, अमेरिका सरकार द्वारा शुरू की गई टैरिफ वार्ताओं के कारण, वैश्विक व्यापार नीति काफी तनावपूर्ण बनी हैं और वैश्विक व्यापार अस्थिर बना है।
लेकिन विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाएं लंबे समय से आपस में जुड़ी हुई हैं और “टैरिफ की छड़ी” कभी भी केवल विरोधियों पर ही नहीं पड़ी है। राजनीतिक संघर्षों के बीच, पूंजी व व्यवसाय व्यावहारिक कार्यों के माध्यम से अपने विकल्प चुन रहे हैं। फेडेक्स के सीईओ ने व्यक्तिगत रूप से चीन की यात्रा टीम का नेतृत्व किया, उसके बाद बोइंग के अधिकारी आए। शीर्ष अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधिमंडल चीन के लिए उड़ान भरने की तैयारी कर रहा है। यह हाल के महीनों में अमेरिका व्यापार समुदाय में सबसे उच्च-स्तरीय बर्फ तोड़ने वाली यात्रा होगी। पूंजी की सबसे संवेदनशील भावना ने दिशा दिखा दी है कि आम-जीत ही सभी पक्षों के लिये जीवित रहने का एकमात्र रास्ता है और सहयोग सही जवाब है। यहां तक कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी कैमरे के सामने स्वीकार किया, “हमें चीन के साथ कुछ बातों पर बातचीत करनी चाहिए, हमें उनके साथ संबंध स्थापित करने चाहिए और हमें उनके साथ आपसी सम्मान का रिश्ता स्थापित करना चाहिए। दोनों देशों को सहयोग के क्षेत्र खोजने चाहिए।” यह चीन-अमेरिका संबंधों के सार को प्रकट करता है।
सभी पक्षों के लिये असली समाधान मार्को रुबियो के शब्द “बातचीत करनी चाहिए” में निहित हैं और अमेरिका-चीन व्यापार परिषद के अध्यक्ष तान सेन द्वारा फेंटेनाइल वार्ता के संबंध में व्यक्त की गई अपेक्षाओं में निहित है। तान सेन ने कहा कि प्रगति के छोटे-छोटे कदम अंततः टैरिफ़ बाधा को हटा देंगे और फेंटेनाइल मुद्दे पर प्रगति चीन और अमेरिका के बीच भविष्य में टैरिफ़ में कटौती का सबसे महत्वपूर्ण कारक होगी। जब फ़िनलैंड के मंत्री ने व्यापार तनाव की दुविधा को उजागर किया और जर्मनी ने “अमेरिका पर निर्भरता कम करने” का आग्रह किया, तो महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा की बिसात ने एक संकेत दिया कि टकराव एक आम-हार वाली स्थिति में समाप्त होता है, जबकि आम-जीत व सहयोग ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है।
दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के रूप में, चीन-अमेरिका आर्थिक व व्यापारिक संबंधों की स्वस्थता व स्थिरता न केवल दोनों देशों के लोगों की भलाई व ख़ुशी को प्रभावित करती है, बल्कि वैश्विक आर्थिक सुधार व विकास पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय आमतौर पर उम्मीद करता है कि चीन-अमेरिका आर्थिक व व्यापारिक वार्ता दोनों देशों के बीच आर्थिक व व्यापारिक संबंधों को समान संवाद एवं परामर्श के माध्यम से मतभेदों को हल करने की सही दिशा में आगे बढ़ाएगी, जिससे विश्व अर्थव्यवस्था में स्थिरता व निश्चितता लाएगी।
अमेरिका “अमेरिका फ़र्स्ट” के अपने आधिपत्यवादी जुनून से चिपका रहना चाहिए या “हितों के जटिल आदान-प्रदान” की गांठ को खोल देना चाहिए? जवाब साफ़ है कि शून्य-योग खेलों के जुनून को छोड़ दें। वैश्विक समृद्धि के कैनवास पर दो महाशक्तियों के लिए मिलकर एक तस्वीर बनाने की गुंजाइश है। व्यापार युद्ध के मैदान में कोई विजेता नहीं होता। केवल साझा समृद्धि के खाके में ही सभी पक्षों का भविष्य समाहित हो सकता है।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
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