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हुक्मनामा श्री हरमंदिर साहिब जी 14 अगस्त 2025

August 14, 2025

हुक्मनामा श्री हरमंदिर साहिब जी 14 अगस्त 2025

Hukamnama : रोसु न कीजै अम्रितु पीजै रहणु नही संसारे ॥ राजे राइ रंक नही रहणा आइ जाइ जुग चारे ॥ रहण कहण ते रहै न कोई किसु पहि करउ बिनंती ॥ एकु सबदु राम नाम निरोधरु गुरु देवै पति मती ॥११॥

अर्थ: (हे पांडे! गुरु के सन्मुख हो के गोपाल का नाम अपने मन की पट्टी पर लिख, उस गोपाल से) नाराजगी ही ना किए रखो, उसका नाम-अमृत पीयो। इस संसार में सदा के लिए बसेरा नहीं है। राजे हों, अमीर हो, चाहे कंगाल हों, कोई भी यहाँ सदा नहीं रह सकता। जो पैदा हुआ है उसने मरना है, (ये नियम) सदा के लिए (अटल) है। यहाँ सदा टिके रहने के लिए तरले करने से भी कोई टिका नहीं रह सकता, इस बात के लिए किसी के आगे तरले लेने व्यर्थ हैं।
(हाँ, हे पांडे! गुरु की शरण आओ) सतिगुरु परमात्मा के नाम की महिमा भरा शब्द बख्शता है जो विकारों से बचा लेता है, और, सतिगुरु प्रभु-पति से मिलने की मति देता है।11।

लाज मरंती मरि गई घूघटु खोलि चली ॥ सासु दिवानी बावरी सिर ते संक टली ॥ प्रेमि बुलाई रली सिउ मन महि सबदु अनंदु ॥ लालि रती लाली भई गुरमुखि भई निचिंदु ॥१२॥

अर्थ: (हे पांडे!) जो जीव-स्त्री गुरु की शरण आती है उसको दुनियावी कोई भी चिन्ता नहीं सता सकती, प्रीतम पति (के प्रेम) में रंगी हुई के मुँह पर लाली आ जाती है। उसको प्रभु-पति प्यार और चाव से बुलाता है (भाव, अपनी याद की कशिश बख्शता है), उसके मन में (सतिगुरु का) शब्द (आ बसता है, उसके मन में) आनंद (टिका रहता) है। (गुरु की शरण पड़ कर) दुनियावी लोक-सम्मान का हमेशा ध्यान रखने वाली (उसकी पहले वाली बुद्धि) खत्म हो जाती है, अब वह लोक-सम्मान का घूंघट उतार के चलती है; (जिस माया ने उसको पति-प्रभु में जुड़ने से रोका था, उस) झल्ली कमली माया का सहम उसके सिर पर से हट जाता है।12।

लाहा नामु रतनु जपि सारु ॥ लबु लोभु बुरा अहंकारु ॥ लाड़ी चाड़ी लाइतबारु ॥ मनमुखु अंधा मुगधु गवारु ॥ लाहे कारणि आइआ जगि ॥ होइ मजूरु गइआ ठगाइ ठगि ॥ लाहा नामु पूंजी वेसाहु ॥ नानक सची पति सचा पातिसाहु ॥१३॥

अर्थ: (हे पांडे! परमात्मा का) श्रेष्ठ नाम जप, श्रेष्ठ नाम ही असल लाभ-कमाई है। जीभ का चस्का, माया का लालच, अहंकार, निंदा, खुशामद, चुगली- ये हरेक काम गलत है (बुरा है)। जो मनुष्य (परमात्मा का स्मरण छोड़ के) अपने मन के पीछे चलता है (और लब-लोभ आदि करता है) वह मूर्ख, मूढ़ और अंधा है (भाव, उसको जीवन का सही रास्ता नहीं दिखता)।

जीव जगत में कुछ कमाने की खातिर आता है, पर (माया का) चाकर बन के मोह के हाथों जीवन-खेल हार के जाता है। हे नानक! जो मनुष्य श्रद्धा को राशि-पूंजी बनाता है और (इस पूंजी से) परमात्मा का नाम खरीदता-कमाता है, उसको सदा-स्थिर पातशाह सदा टिकी रहने वाली इज्जत बख्शता है।13।
आइ विगूता जगु जम पंथु ॥ आई न मेटण को समरथु ॥ आथि सैल नीच घरि होइ ॥ आथि देखि निवै जिसु दोइ ॥ आथि होइ ता मुगधु सिआना ॥ भगति बिहूना जगु बउराना ॥ सभ महि वरतै एको सोइ ॥ जिस नो किरपा करे तिसु परगटु होइ ॥१४॥

अर्थ: (हे पांडे! गोपाल का नाम अपने मन की पट्टी पर लिख) वह (गोपाल) स्वयं ही सब जीवों में मौजूद है, पर ये सूझ उस मनुष्य को आती है जिस पर (गोपाल स्वयं) कृपा करता है। (गोपाल की) भक्ति के बिना जगत (माया के पीछे) पागल हो रहा है। जीव (संसार में) जनम ले के (गोपाल की भक्ति की जगह माया की खातिर) दुखी होता है, माया की तृष्णा को मिटाने-योग्य नहीं होता और आत्मिक मौत का राह पकड़ लेता है। (जगत का पागल-पन देखिए कि) अगर बहुत सारी माया किसी दुष्ट व बुरे व्यक्ति के घर में हो तो उस माया को देख के (गरीब और अमीर) दोनों ही (उस दुष्ट बुरे व्यक्ति के आगे भी) झुकते हैं; अगर माया (पल्ले) हो तो मूर्ख व्यक्ति भी समझदार (माना जाता) है।14।

जुगि जुगि थापि सदा निरवैरु ॥ जनमि मरणि नही धंधा धैरु ॥ जो दीसै सो आपे आपि ॥ आपि उपाइ आपे घट थापि ॥ आपि अगोचरु धंधै लोई ॥ जोग जुगति जगजीवनु सोई ॥ करि आचारु सचु सुखु होई ॥ नाम विहूणा मुकति किव होई ॥१५॥

अर्थ: (हे पांडे! उस गोपाल का नाम अपने मन की पट्टी पर लिख) जो सदा ही (बहुरंगी दुनिया) पैदा करके खुद निर्वैर रहता है, जो जनम-मरण में नहीं है और (जिसके अंदर जगत का कोई) धंधा भटकना पैदा नहीं करता। वह गोपाल स्वयं ही (सृष्टि) पैदा करके स्वयं ही सारे जीव बनाता है, जो कुछ (जगत में) दिखाई दे रहा है वह गोपाल स्वयं ही स्वयं है (भाव, उस गोपाल का ही स्व्रूप है)। (हे पांडे!) जगत भटकना में (फसा हुआ) है, जगत का सहारा वह अगम्य (पहुँच से परे) गोपाल स्वयं ही (जीव को इस भटकना में से निकाल के) अपने साथ मिलने की विधि सिखाता है। (हे पांडे!) उस सदा-स्थिर (गोपाल की याद) को अपना कर्तव्य बना, तब ही सुख मिलता है। उसके नाम से वंचित रह के धंधों से खलासी नहीं हो सकती।15।

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