इंटरनेशनल डेस्क। दक्षिण कोरिया सरकार ने एक नया क़ानून पास किया है। इसके तहत मार्च 2026 से स्कूलों में क्लास के दौरान बच्चे मोबाइल फोन या किसी भी स्मार्ट डिवाइस का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। इसका मकसद बच्चों और टीनएजर्स में स्मार्टफोन की बढ़ती लत को रोकना है। वहीं, सरकार, माता-पिता और शिक्षकों का मानना है कि मोबाइल फोन की वजह से बच्चों का ध्यान पढ़ाई से हट रहा है। बच्चे पढ़ाई के बजाय सोशल मीडिया और गेम्स पर ज़्यादा समय बर्बाद कर रहे हैं। स्मार्टफोन की लत से बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है।
किन्हें मिलेगी छूट?
दिव्यांग (विशेष जरूरत वाले) छात्रों को पढ़ाई के लिए मोबाइल या डिजिटल डिवाइस इस्तेमाल करने की अनुमति होगी। बाकी सभी छात्रों पर यह बैन लागू रहेगा।
तैयारी के लिए मिला समय
यह कानून मार्च 2026 से लागू होगा। तब तक स्कूलों और शिक्षा विभाग को ज़रूरी तैयारी करनी होगी। इसके लिए प्रोटोकॉल बनाए जाएंगे ताकि कानून को सही तरीके से लागू किया जा सके।
छात्रों ने दी ये प्रतिक्रिया
कई छात्र इस फैसले से खुश नहीं हैं। उनका कहना है कि “क्या यह नियम वाकई मोबाइल की लत को रोक पाएगा?” “अगर मोबाइल नहीं होंगे तो पढ़ाई के डिजिटल साधन कैसे इस्तेमाल होंगे?” यानी छात्रों के बीच इस फैसले को लेकर सवाल और शंकाएँ हैं।
और किन देशों में है मोबाइल पर रोक?
दक्षिण कोरिया से पहले कई देशों में यह कदम उठाया जा चुका है। फ्रांस में छोटे बच्चों के लिए मोबाइल फोन पर रोक। फिनलैंड, इटली, नीदरलैंड्स, चीन: अलग-अलग तरीकों से स्कूलों में फोन बैन। ऑस्ट्रेलिया में हाल ही में टीनएजर्स के लिए सोशल मीडिया पर और भी सख्त नियम बनाए गए। नीदरलैंड्स की स्टडी: जुलाई में स्कूलों में मोबाइल बैन के बाद छात्रों का ध्यान पढ़ाई में ज़्यादा लगा।
नतीजा क्या होगा?
यह तो समय बताएगा कि यह नया कानून कितना असरदार साबित होता है। हो सकता है कि बच्चों का ध्यान पढ़ाई की तरफ ज़्यादा जाए। लेकिन सवाल ये भी है कि मोबाइल की लत के असली कारण (सोशल मीडिया, गेम्स, इंटरनेट कंटेंट) को कैसे रोका जाएगा?
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