
इस वर्ष चीन जापानी अतिक्रमण विरोधी युद्ध और विश्व फासीवाद विरोधी युद्ध विजय की 80वीं वर्षगांठ मना रहा है। यह अवसर इतिहास की उस महान गाथा को याद करने का क्षण है जिसमें चीन ने लगभग 14 वर्षों तक कठोर संघर्ष कर विजय प्राप्त की और एशिया ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में फासीवाद की हार सुनिश्चित की।
1931 से 1945 तक चले इस संघर्ष ने चीनी समाज को गहरे जख्म दिए। लाखों लोग मारे गए, शहर और गाँव नष्ट हुए, किंतु चीनी जनता ने अपने साहस और दृढ़ता से जापानी आक्रमणकारियों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। चीन की इस दीर्घकालिक लड़ाई ने मित्र राष्ट्रों को प्रशांत और यूरोपीय मोर्चों पर निर्णायक बढ़त हासिल करने का अवसर दिया। यह स्मृति चीन के लिए केवल विजय का उत्सव नहीं है। यह उस संघर्ष की याद है जिसमें करोड़ों चीनी लोगों ने अपने प्राण न्योछावर किए और देश को आक्रांताओं से मुक्त कराया। चीन आज भी इस कथा को अपनी राष्ट्रीय पहचान और आत्मगौरव के केंद्र में रखता है।
चीन की राजधानी पेइचिंग में 3 सितंबर की सुबह 9 बजे से तियानमेन चौक में एक भव्य समारोह आयोजित किया जाएगा, जिसका उद्देश्य “चीन के लोगों की युद्ध-विरोधी जापानी आक्रमण और विश्व के जंग-विरोधी युद्ध में विजय” की 80वीं वर्षगांठ को श्रद्धा और गौरव के साथ मनाना है। इस कार्यक्रम का प्रारंभ राष्ट्रगान, झंडोत्थान, और सैनिकों की परेड के साथ होगा, जिसमें महासचिव शी चिनफिंग एक महत्वपूर्ण भाषण देंगे और सेना का निरीक्षण करेंगे। लगभग 70 मिनट की एक भव्य सैन्य परेड होगी, जिसमें नई-नई युद्ध क्षमताओं का प्रदर्शन होगा—ड्रोन, हायपरसोनिक मिसाइलें, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, तैरने वाले वाहन, आदि। यह परेड आधुनिक चीनी सशस्त्र बलों की क्षमताओं और तकनीकी विकास को उजागर करती है। दोपहर में एक श्रद्धांजलि सभा (रेसेप्शन) का आयोजन, जहां शी चिनफिंग एक और महत्वपूर्ण भाषण देंगे। शाम को पेइचिंग में एक सांस्कृतिक–मनोरंजक कार्यक्रम (गाला) होगा, पार्टी व राज्य के शीर्ष नेता इस में भाग लेंगे।
डॉ. द्वारकानाथ कोटनीस: भारत से मिला चीन का मित्र
इस युद्ध में चीन के लोगों को केवल अपने देशवासियों से ही नहीं, बल्कि विश्वभर से समर्थन मिला। भारत से भेजे गए इंडियन मेडिकल मिशन में सबसे प्रमुख नाम था डॉ. द्वारकानाथ कोटनीस। 1938 में पंडित जवाहरलाल नेहरू और नेताजी सुभाषचंद्र बोस की पहल पर पाँच भारतीय डॉक्टरों का एक दल चीन भेजा गया था। डॉ. कोटनीस ने उस समय की कठोर परिस्थितियों में हजारों घायल सैनिकों और नागरिकों का इलाज किया। उन्होंने आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों को चीन के ग्रामीण इलाकों तक पहुँचाया और स्थानीय जनता का विश्वास जीता। दुर्भाग्यवश, 1942 में मात्र 32 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई, किंतु उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षण तक चीन की सेवा की।
आज भी चीन उन्हें “कोटनीस दादा”कहकर श्रद्धापूर्वक याद करता है। उनकी स्मृति में शीच्याच्वांग शहर में एक स्मारक और अस्पताल है, जो चीन–भारत मित्रता की अनमोल निशानी है। डॉ. कोटनीस के परिवार को 3 सितंबर को चीनी जनता के जापानी अतिक्रमण विरोधी युद्ध और विश्व फासीवाद विरोधी युद्ध विजय की 80वीं वर्षगांठ मनाने के समारोह में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है। यह वर्षगाँठ न केवल ऐतिहासिक स्मरण का अवसर है, बल्कि यह चीन और भारत जैसे देशों के बीच साझा मानवीय मूल्यों और सहयोग की भावना को भी दर्शाती है। डॉ. कोटनिस की विरासत आज भी दोनों देशों के बीच मैत्री की एक जीवंत मिसाल है। इस अवसर पर, हम उन सभी वीरों को सलाम करते हैं जिन्होंने मानवता और शांति के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया।
अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी और कूटनीतिक संदेश
समारोह में 26 विदेशी राष्ट्राध्यक्ष और प्रमुख नेतृत्वकर्ता आमंत्रित किए गए हैं, जिनमें रूस के व्लादिमीर पुतिन, उत्तर कोरिया के किम जोंग-उन, कंबोडिया के नरोदों सिहामोनी, वियतनाम के लुआंग क्वोंग, इंडोनेशिया के प्राबोवो सुबियांतों, मलेशिया के अनवर इब्राहिम, नेपाल के केपी शर्मा ओली, इज़राइल, कज़ाखस्तान आदि के नेता शामिल हैं। ऑस्ट्रेलिया के पूर्व मंत्रियों डैन एंड्रयूज और बॉब कैर भी सम्मानित अतिथि के रूप में शामिल होंगे—कैरे का कहना है कि वह द्वितीय विश्व युद्ध में चीन की भूमिका को सम्मानित करने के लिए आए हैं। यह आयोजन पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देने और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के समर्थन का मंच बना।
अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी और कूटनीतिक संदेश यह आयोजन पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देने और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के समर्थन का मंच बना। आज जब विश्व कई संकटों—भू-राजनीतिक टकराव, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और आर्थिक असमानता—से जूझ रहा है, चीन अपने इतिहास का उपयोग यह संदेश देने के लिए कर रहा है कि शांति और सहयोग ही स्थायी मार्ग हैं। किंतु इसके साथ यह भी सच है कि पेइचिंग परेड में प्रदर्शित हथियार और सैन्य शक्ति यह दर्शाते हैं कि चीन सुरक्षा और शक्ति संतुलन को भी बराबरी से महत्व देता है। इतिहास ने चीन को गौरव और बलिदान की गाथा दी है, और वर्तमान उसे वैश्विक शक्ति के रूप में उभरने का अवसर दे रहा है।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक—देवेंद्र सिंह)
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