इंटरनेशनल डेस्क: साल 1981 में विश्व खाद्य दिवस मनाने की शुरूआत हुई। इसी दिन 1945 में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन यानी एफएओ की स्थापना हुई थी। इस संगठन का उद्देश्य वैश्विक भूख और खाद्य सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ाना है। इस दिवस को विश्व के कई देशों की सरकारें, अंतरराष्ट्रीय संगठन, और सामाजिक संस्थाएं खाद्य उत्पादन, वितरण और पोषण से जुड़ी गतिविधियों का विशेष तौर पर आयोजन करती हैं।
जिसका मकसद है, खाद्य एवं कृषि उत्पादन के विकास और सतत कृषि विकास को बढ़ावा देना है। इसका यह भी लक्ष्य यह सुनिश्चित करना भी है कि सभी को पौष्टिक भोजन उपलब्ध हो सके। एक तरह से यह दिवस भूख और कुपोषण के विरुद्ध कार्रवाई का एक वैश्विक आह्वान है, जो सरकारों, संगठनों और व्यक्तियों को भूख मुक्त विश्व की दिशा में काम करने के लिए प्रोत्साहित करता है। विश्व खाद्य दिवस लोगों को यह याद दिलाता है कि भूख, कुपोषण और खाद्य असमानता जैसे मुद्दे केवल विकासशील देशों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक वैश्विक चुनौती है।
जहां तक चीन की बात है, दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था ने चार दशकों में, चीन ने उल्लेखनीय आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन किए हैं। जिसके जरिए 77 करोड़ से अधिक लोग अत्यधिक गरीबी से बाहर निकले हैं और वैश्विक गरीबी उन्मूलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। साल 2021 में, चीन ने अपने देश से गरीबी उन्मूलन का ऐलान किया था। जिस पर कार्य करते हुए चीन ग्रामीण पुनरोद्धार, टिकाऊ कृषि पद्धति के साथ ही शहर और गांव के बीज के आर्थिक विभाजन को कम करने की दिशा में कार्य करते हुए नए चरण में प्रवेश कर चुका है।
आज चीन की जनसंख्या 1.4 अरब है। जिनके लिए अपने लिए पर्याप्त अनाज उत्पादन करने का लक्ष्य हासिल कर चुका है। इस क्षमता के जरिए चीन वैश्विक खाद्य सुरक्षा में बड़ा योगदान दे रहा है। चीन ने यह लक्ष्य खेती में आधुनिक तकनीक और मशीनीकरण के साथ ही सिंचाई व्यवस्था में निरंतर निवेश के साथ-साथ बेहतर खाद्य सुरक्षा का परिणाम है।
हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी की ओर बड़े पैमाने पर वापसी को रोकने में चीन को अभी भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। चीन के गांवों में अब 20 करोड़ से अधिक छोटे किसान हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर उपभोग किए जाने वाले अधिकांश खाद्यान्न का उत्पादन करते हैं और 70 प्रतिशत खेती योग्य भूमि का प्रबंधन करते हैं। चीन में सुदूर इलाकों में रहने वाले कुछ लोगों के लिए, खराब बुनियादी ढाँचा और बाजार तक सीमित पहुँच है।
चीन ने अपनी आबादी का पोषण में लगातार सुधार जारी है । बाल कुपोषण की दर भी बेहतर हुई है। चीन के साथ विश्व खाद्य प्रोग्राम के कार्य में ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूली बच्चों के पोषण में भी सुधार हुआ है। छोटे किसानों की उत्पादकता और आय में वृद्धि के साथ ही कृषि लचीलापन को मजबूत करने के लिए अभिनव पायलट परियोजनाएं शामिल हैं। चीन ने अपनी विकास प्राथमिकताओं और सतत विकास के लिए 2030 तक का एजेंडा तय किया है, जिसके तहत भूख और गरीबी को पूरी तरह खत्म कर देना है।
चीन ने अंतर्राष्ट्रीय विकास में दानदाता के रूप में भी अपनी भूमिका बढ़ाई है। विश्व खाद्य कार्यक्रम के साथ चीन ने खुद की सीमा के अंदर संसाधन जुटाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसके साथ वैश्विक मानवीय और विकास प्रयासों का वैश्विक स्तर पर समर्थन भी कर रहा है।
यहां ध्यान देने की बात है कि हैती लगातार हिंसा और लंबे आर्थिक संकट के कारण दुनिया के सबसे भूखे देशों की सूची में पहले नंबर पर बना हुआ है। यहां यह भी याद करने की बात है कि दुनिया भर में हर साल करीब 250 करोड़ टन खाना बर्बाद हो जाता है। सिर्फ कोरोना काल के पहले ही दुनिया में 93 करोड़ टन खाना खराब हुआ था। जहां तक भारत की बात है तो यहां राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के तहत करीबी चौरासी करोड़ लोगों को सब्सिडी पर अनाज दिया जा रहा है।
जिसके जरिए भारत में भुखमरी की स्थिति लगातार कम हुई है। इसके अलावा मिड डे मील योजना, आंगनवाड़ी कार्यक्रम और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी योजनाएं भूख को कम करने का प्रयास कर रही हैं। जहां तक भारत में खाने की बर्बादी की बात है तो यहां हर साल करीब 40 प्रतिशत खाना बर्बाद हो जाता है। भारतीय मुद्रा में यह रकम 92 हजार करोड़ रुपया होती है।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक— उमेश चतुर्वेदी)
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