
Hukamnama: सलोकु मः ३ ॥ नानक नावहु घुथिआ हलतु पलतु सभु जाइ ॥ जपु तपु संजमु सभु हिरि लइआ मुठी दूजै भाइ ॥ जम दरि बधे मारीअहि बहुती मिलै सजाइ ॥१॥
पद्अर्थ: हिरि लइआ = चुराया जाता है।
अर्थ: हे नानक! नाम से टूटे हुए का लोक-परलोक सब व्यर्थ जाता है; उनका जप तप और संजम सब छिन जाता है, और माया के मोह में (उनकी मति) ठॅगी जाती है; जम के द्वार पर बँधे हुए मार खाते हैं और (उनको) बहुत सज़ा मिलती है।
मः ३ ॥ संता नालि वैरु कमावदे दुसटा नालि मोहु पिआरु ॥ अगै पिछै सुखु नही मरि जमहि वारो वार ॥ त्रिसना कदे न बुझई दुबिधा होइ खुआरु ॥ मुह काले तिना निंदका तितु सचै दरबारि ॥ नानक नाम विहूणिआ ना उरवारि न पारि ॥२॥ {पन्ना 649}
पद्अर्थ: उरवारि = उरला पासा, इस लोक में।
अर्थ: निंदक मनुष्य संत-जनों से वैर करते हैं और दुर्जनों से मोह-प्यार रखते हैं; उन्हें लोक-परलोक में कहीं सुख नहीं मिलता, बार-बार दुविधा में ख्वार हो हो के, पैदा होते मरते हैं; उनकी तृष्णा कभी नहीं उतरती, हरी के सच्चे दरबार में उन निंदकों के मुँह काले होते हैं। हे नानक! नाम से टूटे हुए लोगों को ना इस लोक में ना ही परलोक में (आसरा मिलता है)।2।
पउड़ी ॥ जो हरि नामु धिआइदे से हरि हरि नामि रते मन माही ॥ जिना मनि चिति इकु अराधिआ तिना इकस बिनु दूजा को नाही ॥ {पन्ना 649}
पद्अर्थ: मनि चिति = मन से चिक्त से। मन चिक्त से पूरी लगन से।
अर्थ: जो मनुष्य हरी का नाम सिमरते हैं, वे अंदर से हरी-नाम में रंगे जाते हैं; जिन्होंने ऐकाग्रचिक्त हो के एक हरी को आराधा है, वे उसके बिना किसी और को नहीं जानते।
सेई पुरख हरि सेवदे जिन धुरि मसतकि लेखु लिखाही ॥ हरि के गुण नित गावदे हरि गुण गाइ गुणी समझाही ॥ वडिआई वडी गुरमुखा गुर पूरै हरि नामि समाही ॥१७॥ {पन्ना 649}
पद्अर्थ: मसतकि = माथे पर। गुणी = गुणों वाला प्रभू। नामि = नाम में।
अर्थ: (पिछले किए कर्मों के अनुसार) शुरू से ही जिनके माथे पर (संस्कार-रूप) लेख उकरे हुए हैं, वह मनुष्य हरी को जपते हैं; वे सदा हरी के गुण गाते हैं, गुण गा गा के गुणों के मालिक हरी की (औरों को) शिक्षा देते हैं। गुरमुखों में ये बड़ा गुण है कि पूरे सतिगुरू के द्वारा हरी के नाम में लीन होते हैं।17।
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