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Sanjay Leela Bhansali की ‘गुज़ारिश’ आज भी क्यों है इतनी दमदार? यहां पढ़ें 5 बड़ी वजह

November 19, 2025

Sanjay Leela Bhansali की ‘गुज़ारिश’ आज भी क्यों है इतनी दमदार? यहां पढ़ें 5 बड़ी वजह

एंटरटेनमेंट डेस्क: रिलीज़ के पंद्रह साल बाद भी गुज़ारिश संजय लीला भंसाली की सबसे साहसी और दिल छू लेने वाली फिल्मों में से एक बनी हुई है, एक ऐसी फिल्म जिसने समाज की सोच को उस समय चुनौती दी थी, जब इच्छामृत्यु और सम्मान के साथ मरने के अधिकार पर खुलकर बातें भी नहीं होती थीं।

जब बॉलीवुड मुश्किल और गहरी कहानियों पर बहुत कम काम करता था, तब भंसाली जिनकी कभी-कभी राज कपूर और गुरु दत्त जैसे सिनेमा दिग्गजों से तुलना की जाती है ने एक बेहद इंसानी कहानी बनाई, जिसमें दया, दर्द और चुनाव की बात देखने मिली थी। ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय बच्चन की मज़बूत परफॉर्मेंस के साथ, गुज़ारिश ने न सिर्फ फिल्मों की सीमाओं को आगे बढ़ाया, बल्कि एक ऐसी चर्चा शुरू की, जिसके लिए भारत उस समय पूरी तरह तैयार नहीं था। इसी वजह से इसकी अहमियत आज और ज्यादा बढ़ गई है। आइए देखें कि भंसाली की ये बोल्ड फिल्म सिर्फ देखने और महसूस करने लायक नहीं थी, बल्कि अपने समय से कहीं आगे थी, जो इज़्ज़त, दर्द और मरने के हक़ जैसे मुद्दों पर सीधा ध्यान देती है।

1. अपने समय से आगे की फिल्म

जब गुज़ारिश 2010 में आई, तो उस समय एक मेनस्ट्रीम बॉलीवुड फिल्म का यूथेनेसिया या “दया मृत्यु” जैसे गंभीर विषय पर बात करना बहुत कम होता था, और कई लोगों के लिए यह थोड़ा असहज भी था। लेकिन भंसाली ने हिम्मत दिखाते हुए अपनी कहानी के केंद्र में एथन मस्करेनहास (जिसे ऋतिक रोशन ने निभाया) को रखा एक ऐसा जादूगर, जो एक हादसे के बाद पूरी तरह से शरीर से लाचार हो गया था और जो अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने के अधिकार के लिए कोर्ट में गुहार लगा रहा था।

यह कोई दुनिया से भागने वाली कहानी नहीं थी; यह दुख, अपने फैसलों और अपनी इच्छा को समझने की एक बहुत ही इंसानी और नाज़ुक कसौटी थी। भंसाली ने कहा है कि उन्होंने इस विषय पर लगभग एक साल रिसर्च किया। उन्होंने जान-बूझकर इस विषय पर बनी दूसरी फिल्में नहीं देखीं, ताकि उनकी सोच साफ और अपनी हो। यह उनकी गंभीरता को दिखाता है कि उन्होंने इस मुद्दे को किसी सनसनी की तरह नहीं लिया, बल्कि एक असली, चल रही बहस की तरह देखा कि कब ज़िंदगी बहुत भारी हो जाती है, और क्या इंसान को यह हिम्मत होनी चाहिए कि वो कह सके कि “बस, अब बहुत हो गया।”

2. इज्जत और गरिमा के साथ मौत पर खुली बातचीत

उस समय जब भारत में इच्छामृत्यु (और आज भी काफी हद तक) एक बड़ा टैबू थी, गुजारिश ने बातचीत की एक जगह खोली। भंसाली ने बाद में कहा था कि फिल्म रिलीज़ होने पर काफी “हंगामा” हुआ था। लेकिन यही हंगामा दिखाता है कि फिल्म ने लोगों के दिल की सीधी नस को छू लिया; इसने दर्शकों को मजबूर किया कि वो सिर्फ दर्द झेल रहे शरीर के लिए नहीं, बल्कि उस इंसान की इज़्ज़त के बारे में भी सोचें, जो खुद को एक कभी न खत्म होने वाली ज़िंदगी में फंसा हुआ महसूस कर रहा है।

ईथन की कहानी के ज़रिए भंसाली सिर्फ दर्द को दिखाते नहीं हैं, वो उसे इंसानी रूप देते हैं। उसका दर्द खूबसूरत बनाकर नहीं दिखाया गया; उसकी इच्छा कोई बड़ा नाटकीय कदम नहीं है, बल्कि बहुत निजी है। ऐसा करते हुए फिल्म कई नाज़ुक सोचने वाले और कानूनी सवाल खड़ी करती है: कब ज़िंदगी, ज़िंदगी जैसी नहीं रह जाती? फैसले का हक किसके पास होना चाहिए?

हम दया और समाज के नियमों के बीच संतुलन कैसे बनाएँ? सालों बाद, जब भारत की सुप्रीम कोर्ट ने असहनीय और ठीक न होने वाली बीमारियों में “सम्मान के साथ मरने का अधिकार” को मंज़ूरी दी, तब भंसाली ने याद दिलाया कि गुज़ारिश ने यह बातचीत तभी शुरू करने की कोशिश की थी, जब देश इस विषय पर खुलकर बात करने के लिए तैयार भी नहीं था।

3. भंसाली का संवेदनशील काम

भंसाली जिस भारी विषय को दिखा रहे हैं, उसे बहुत करुणा के साथ संभालते हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने इसे “एक बहस बताया जिसका जवाब जल्दी नहीं मिलेगा।” लेकिन भारीपन में जाने के बजाय, वो अपनी पहचान बने खूबसूरत विज़ुअल्स, संगीत और भावनाओं से भरी कहानी का इस्तेमाल करते हैं, ताकि अनुभव बोझिल नहीं बल्कि डूब जाने जैसा लगे। इंसानी दर्द को “श्रद्धांजलि” देने का उनका फैसला जैसा उन्होंने खुद कहा वह बहुत कुछ बताता है। दर्द से नज़रें चुराने के बजाय, भंसाली उसे इज़्ज़त देते हैं और उन लोगों को सम्मान देते हैं जो ऐसी ज़िंदगी जीते हैं जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

4. शानदार परफॉर्मेंस: ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय बच्चन

फिल्म ‘गुज़ारिश’ की कलात्मक ताकत उसकी कास्टिंग में भी दिखती है। ऋतिक रोशन ने ईथन के किरदार में नर्मी, झुंझलाहट, हल्की-सी मज़ाकिया बातों और शांत मज़बूती का अच्छा संतुलन दिखाया है। उन्होंने असली पैरालाइज़्ड मरीज़ों से मिलकर वक्त बिताया, उन लोगों से मिले जिनकी ज़िंदगी को वे पर्दे पर दिखा रहे थे, और उन्हें “असली हीरो” कहा। उनकी एक्टिंग ने इस फिल्म को सिर्फ एक आइडिया नहीं रहने दिया, बल्कि इसे दिल से महसूस होने वाली इंसानी कहानी बना दिया।

ऐश्वर्या राय बच्चन, जो फिल्म में ईथन की नर्स सोफिया हैं, कहानी में करुणा, वफ़ादारी और बारीकियों की भावना लाती हैं। वो अपने किरदार को सिर्फ़ एक “फरिश्ता जैसी देखभाल करने वाली” महिला बनाकर आसान नहीं करतीं; बल्कि, ईथन के साथ उनके रिश्तों के ज़रिए वो प्यार, फ़र्ज़ और बेबसी की असली उलझन दिखाती हैं। भंसाली के निर्देशन में, दोनों कलाकार अपने सबसे शांत लेकिन गहरे असर वाले अभिनय देते हैं, क्योंकि इस फिल्म को चमक-दमक नहीं, बल्कि सच्ची समझ और सहानुभूति की ज़रूरत थी।

5. क्यों 15 साल बाद भी गुजारिश रखती है खास जगह

अब भी भारत में बहुत कम मेनस्ट्रीम की फिल्में हैं जो इच्छामृत्यु जैसे विषय को इतनी साफ़ और सीधी तरह छूती हैं। भंसाली का यह बड़ा कदम दिखाता है कि सिनेमा सच में समाज की सख़्त मान्यताओं को चुनौती दे सकता है। एक इंसान की “दया-मृत्यु” की व्यक्तिगत विनती को कहानी बनाकर, गुज़ारिश ने मौत में गरिमा जैसे सवालों को लोगों के बीच थोड़ा सामान्य किया और अपने तरीके से एक बड़े सामाजिक और कानूनी बातचीत का हिस्सा बनी। भंसाली की सोच, और उसके साथ ऋतिक रोशन व ऐश्वर्या राय बच्चन का काम, साफ़ दिखाता है कि कला उन लोगों की आवाज़ बन सकती है जो हाशिये पर हैं, जो दर्द झेल रहे हैं, और जिनकी बातें बेहद निजी होती हैं।

आख़िर में, जब गुज़ारिश अपनी 15वीं सालगिरह मना रही है, तो हम पीछे मुड़कर संजय लीला भंसाली को शुक्रिया कह सकते हैं कि उन्होंने इतनी नाज़ुक, विवादित और अपने समय से आगे की, इंसानियत से भरी कहानी बताने की हिम्मत की। यह फिल्म हमें मज़बूती से याद दिलाती है कि सिनेमा का सबसे बड़ा तोहफ़ा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि ज़िंदगी, मौत और सम्मान जैसे मुश्किल सवाल पूछने की हिम्मत भी है।

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