Last Updated: September 23, 2026

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COP 30: क्या इस बार दुनिया सच में बदलेगी?

November 21, 2025

COP 30: क्या इस बार दुनिया सच में बदलेगी?

इन दिनों ब्राज़ील के अमेज़न के दिल में बसे बेलेम शहर में दुनिया की नज़रें टिकी हैं। COP 30 सिर्फ एक सम्मेलन नहीं, बल्कि समय के उस मोड़ पर खड़ी पुकार है जहाँ धरती खुद सवाल कर रही है कि इंसान आखिर कब सुधरेगा। टीवी और सोशल मीडिया पर इसका नाम जितना गूँज रहा है, उतना ही कम लोग जानते हैं कि यह है क्या और क्यों दुनिया इसके इर्दगिर्द घूम रही है।

COP यानी काँफ्रेंस ऑफ द पार्टीज़। यह संयुक्त राष्ट्र की सालाना बैठक है जिसमें लगभग 200 देश शामिल होते हैं। राष्ट्रपति से लेकर कार्यकर्ता तक, वैज्ञानिकों से लेकर उद्योगपतियों तक, सब एक ही सवाल पर माथापच्ची करते हैं कि इस धरती को कैसे बचाया जाए। दुनिया पिछले 30 साल से यह रस्म निभा रही है, लेकिन अब मौसम का बिगड़ता मिज़ाज साफ बता रहा है कि सिर्फ बैठकों से काम नहीं चलेगा।

इस साल COP को बेलेम में आयोजित करने का फैसला प्रतीकात्मक भी है और चेतावनी भी। अमेज़न को धरती के फेफड़े कहा जाता है। यही जंगल कार्बन डाइऑक्साइड को सोखते हैं और पृथ्वी की साँसें बचाए रखते हैं। नेताओं को यहाँ बुलाकर मानो प्रकृति यह कहना चाहती है कि कागज़ों पर किए वादों से ज़्यादा अहम है ज़मीन का सच। पिछले दो सालों में दुनिया भर में जिस तरह की गर्मी, सूखा और तूफान आए हैं, उसने पेरिस समझौते के 1.5 डिग्री लक्ष्य को खतरे में डाल दिया है। अब हर देश को 2035 तक के अपने नए उत्सर्जन लक्ष्य तय करने ही होंगे।

लेकिन जलवायु की राजनीति में सिर्फ लक्ष्य तय करने से कहानी पूरी नहीं होती। मुद्दा पैसे का भी है। अमीर देशों ने विकासशील देशों को 1.3 ट्रिलियन डॉलर देने का वादा किया था, ताकि वे स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ सकें। यह वादा आज भी अधर में है। कौन देगा, कब देगा और कौन तय करेगा कि किसे कितना मिलेगा? इसी सवाल पर बेलेम की धूप जितनी तेज है, बहस उतनी ही गर्म।

इसके बाद आता है सबसे विवादित सवाल- जीवाश्म ईंधन। दुनिया की तरक्की कोयला, तेल और गैस पर खड़ी है, पर अब वही धरती का तापमान बढ़ा रहे हैं। पिछले COP में यह मान लिया गया कि इन्हें धीरे-धीरे छोड़ना होगा, पर कोई भी देश यह नहीं बता पाया कि ऐसा कैसे होगा। अगर कोयले की खदानें बंद होंगी तो लाखों परिवारों का क्या होगा? तेल उद्योग में काम करने वाले करोड़ों लोगों की रोज़ी कौन सँभालेगा? यही वह जगह है जहाँ आदर्श सोच की टक्कर सख्त हकीकत से होती है।

भारत इस बहस में हमेशा से अपनी जगह मजबूती से रखता आया है। उसका तर्क साफ है कि अमीर देशों ने दो सदियों तक धरती का सबसे ज़्यादा नुकसान किया है, इसलिए ज़िम्मेदारी भी उनकी अधिक होनी चाहिए। विकासशील देशों को अपनी जनता को गरीबी से निकालने के लिए कुछ गुंजाइश मिलनी ही चाहिए। 

उधर, चीन भी बड़ा किरदार निभा रहा है। वह दुनिया में सबसे ज़्यादा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करता है, लेकिन वह खुद को विकासशील देश बताता है और दावा करता है कि उसे विकास करने का पूरा अधिकार है। इस बार अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने पेरिस समझौते से हटने का फैसला दोहराया है, जिसका सीधा मतलब है कि चीन को नेतृत्व का बड़ा मौका मिल गया है। चीन ने इस कॉन्फ्रेंस में 800 से ज़्यादा प्रतिनिधि भेजे हैं। यह दिखाता है कि वह जलवायु की राजनीति को कितनी गंभीरता से ले रहा है।

COP 30 की असली कसौटी यही है कि यह सम्मेलन सिर्फ भाषणों का मंच न बने। दुनिया अब वादों से थक चुकी है। जनता चाहती है कि धरती को बचाने की लड़ाई वास्तविक कदमों में दिखाई दे। अगर बेलेम से लौटते समय दुनिया के नेता ठोस फैसले लेकर जाएँ, तो शायद आने वाली पीढ़ियाँ हमें यह कहने का मौका दें कि हमने आखिरी समय में सही दिशा चुनी थी। अगर नहीं, तो भविष्य हमें उस पीढ़ी के रूप में याद करेगा जिसने चेतावनी सुनी, लेकिन कदम नहीं बढ़ाया।

(अखिल पाराशर, चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

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